Home News Point बंगाली नाटक­ “भोरेर आशाएं” ने दिखाई कोरोना से उपजे मानसिक तनाव व जीने के जज़्बे की झलक

बंगाली नाटक­ “भोरेर आशाएं” ने दिखाई कोरोना से उपजे मानसिक तनाव व जीने के जज़्बे की झलक

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बहुभाषी ड्रामा फेस्टिवल का तीसरा दिन

 

रोहतक, 17 जुलाई। कला एवं संस्कृति कार्य विभाग, हरियाणा के सहयोग से हरियाणा इंस्टिट्यूट ऑफ परफॉर्मेंस आर्ट्स (हिपा) द्वारा स्थानीय पठानिया वर्ल्ड कैंपस में चल रहे बहुभाषी ड्रामा फेस्टिवल के तीसरे दिन नाटक ‘भोरेर आशाएं’ यानी ‘सुबह की आस में’ का मंचन हुआ। यह कोरोना महामारी में आम आदमी की परेशानियों पर आधारित बांग्ला भाषा में सोलो प्रस्तुति रही, जिसमें अभिनेत्री ने कोरोना काल में लगे लॉक डाउन के कारण उपजी तोड़ देने वाली परिस्थितियों का सजीव चित्रण किया गया। रोहतक के विधायक बीबी बतरा नाट्य संध्या के मुख्यातिथि और पार्षद गुलशन इशपुनियानी व बीइओ विजयेंद्र हुड्डा विशिष्ट अतिथि रहे। बीबी बतरा ने अपने संबोधन में कहा कि कोरोनाकाल में भय का माहौल बन गया था। लोगों के काम-धंधे बंद हो गए और रोटी के लाले पड़ गए। यही नहीं, बहुत से लोगों को असमय ही अपने प्रियजनों को खोना पड़ा। ऐसे समय में कलात्मक माध्यमों ने इस महामारी से उपजी हताशा व निराशा को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई और लोगों को हौसला दिया।

नाटक की कहानी एक छोटे से शहर में रहने वाली युवती की है, जो एक कपड़ों की दुकान चलाती है। लॉकडाउन के बाद वह अपनी दुकान को फिर से खोलने के लिए उत्साहित है जो पिछले 8 महीने से बन्द थी। वर्षों से उसके परिवार की आजीविका का एकमात्र साधन रही इस दुकान को खोलने के बाद युवती उसकी साफ-सफाई और कपड़ों की सजावट करती हुई वहां रखे पुतलों (मनेक्वीन) से बात करना शुरू कर देती है। वह बताती है कि किस तरह उसने कॉलेज की पढ़ाई की और पढ़ाई के बाद दुकान की जिम्मेदारी लेते हुए इस छोटी सी दुकान को शहर की जानी मानी दुकान में परिवर्तित कर दिया। उसके पिताजी अपने दोस्तों के साथ दुकान में शतरंज खेलते थे। इन सभी स्मृतियों को पुतलों के साथ साझा करते हुए वह सोचती है कि कैसे उसने अचानक आए कोरोना काल के अंतहीन लगने वाले लॉकडाउन को झेला और कैसे अनलॅाक के बाद के मानसिक संघर्ष, भावनात्मक उथल पुथल एवं सामाजिक अलगाव को जिया। अलगाव को कायम रखने की ज़िद में पिता को साथियों से अलग करने की आत्मग्लानि की टीस मन में रहती है। कोरोना की वजह से हुई पिता की मुत्यु के लिए भी वह स्वयं को ही उत्तरदाई ठहराती है। कोविड के चलते शारीरीक, मानसिक व सामाजिक विकृतियों ने नए सिरे से जन्म ले लिया। करीबी मित्र और रिश्तेदार भी अजनबी से लगने लगे। मास्क, दस्ताने, सैनिटाइज़र हमारे साथ जुड़ गए। फेस कवर और मुखौटा अंधेरी प्रथाओं का प्रतीक नहीं रहे। यह दुनिया मानों लंगडा कर बस किसी तरह चल रही थी, पर इस अंधेरे दौर में भी एक आशा है – आने वाले सवेरे की आशा…!

संजय चटोपाध्याय के इस नाटक का निर्देशन मोनालिसा दास ने किया और नाटक का एकमात्र किरदार भी उन्होंने ही निभाया। संगीत प्रद्युत चटर्जी का रहा, जिसका संचालन शमुन्द्रों सिंह ने किया। प्रकाश व्यवस्था राजस्थान के प्रख्यात रंगकर्मी डॉ. देशराज मीणा की रही। मोनालिसा दास का अभिनय इतना जीवंत रहा कि भाषा समझ में न आने के बावजूद दर्शकों ने नाटक का भरपूर आनंद लिया।

इस अवसर पर बीबी बतरा, गुलशन इशपुनियानी व विजयेंद्र हुड्डा के अलावा चित्रकार शक्ति अहलावत, हिपा के अध्यक्ष विश्वदीपक त्रिखा, पठानिया स्कूल के निदेशक अंशुल पठानिया, फेस्टिवल डायरेक्टर अविनाश सैनी, कॉर्डिनेटर रिंकी बतरा, शक्ति सरोवर त्रिखा, सुभाष नगाड़ा, सुजाता, विकास रोहिल्ला, यतिन वधवा, रजत बिंद्रा, गुरदयाल तथा पठानिया स्कूल के स्टॉफ सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। मंच संचालन सुजाता रोहिल्ला ने किया।

– अविनाश सैनी।

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