Home साहित्य दर्पण शाम होते ही होली के रंग… Shaad..

शाम होते ही होली के रंग… Shaad..

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सच मानना बिलकुल सच
होली के दिन मेरे चहेरे पे अनेक रंग थे वो रंग मेरे आपने नही थे लगाये थे अनेक हाथों ने अपनी मुस्कराहट के साथ …
मैने भी इन रंगों की सेल्फी ली और आपना चहेरा ढूंढने लगा वो गुम था उस वक्त मेरे चेहरे पे भी ख़ुशी की मुस्कान थी …गली में रंगों के साथ होली खेलते बच्चो के पास से जब मै गुजरा तो वो थोड़ा सा दूर हो गए थे ..उस वक्त मेरे चहेरे के रंग देखने लायक थे मेने कहा क्यों बच्चो मुझ पे रंग नही फेकोगे ….इक बच्चा बोला नही अंकल आप गुस्सा मान जायोगे ..शायद ये भी एक रंग था …की अक्सर हम नही चाहते की कोई रंग लगाये फिर भी मेने कहा आ जाओ यार बस फिर भी क्या नन्हे हाथों ने मेरे चहेरे पे रंग लगाये उस वक्त बच्चो के चहेरे के रंग देखने लायक थे
हर कोई चाहता है कि कोई रंग लगाये मगर हर कोई इस करके नही लगता कि हम गुस्से न हो जाये …..खुशकिस्मत हूँ की मेने आज अनेक रंगों को देखा है मेरा खुद का चेहरा कही गुम था
दोपहर बाद जब घर आया तो स्नान के बाद दर्पण पे चेहरे को देखा तो वो सब रंग उतर गए कुछ रंगों को मैने खुद रगड़ रगड़ कर उतार दिया अब मेरे पास मेरे चहेरे का अपना ही रंग था …क्योकि होली बीत गई थी…..
कौन रखता है सम्भाल कर रंगों को …शायद इसलिए मेरे पास सब रंग नही है सच बहुत है रंग मेरे पास जो
वक्त दर वक्त जरूरत के मुताबिक बदल लेता हूँ या दुनिया को दिखा देता हूँ
होली के रंग तो उस कमीज पेंट में अभी भी लगे है जो मेने उतार कर वाशिंग मशीन में रख दी और कुछ ही देर बाद वो पानी में बह जाएंगे फिर वही कपड़े प्रेस करके मैं पहन लूँगा दर्पण के सामने मेरे चहेरे पर वही रंग है जो होली से पहले थे….सच मानना ……अगली होली तक इंतज़ार करेगे …मैं …मेरे …कपड़े …उन अनेको रंगों का जो तेरे साथ थे उस मुस्कराहट को लिए जो लगाते वक्त तेरे और मेरे चहेरे पे थी……Shaad

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