चुनावी तड़का ……..“आज का नाटक यही खत्म होता है “तुम जीत के खुश हम हार के भी खुश क्योकि लड़ाई सिर्फ हमारी तुम्हारी नहीं है बल्कि लड़ता तो कोई और है हरता भी कोई और है और जीतता भी कोई और है।हम तो सिर्फ चुनावी रण के मोहरे है ठप्पे है या फिर कठपुतलिया ………..बस दोस्त अब कुछ दिनों के …
चुनावी तड़का…..

