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जब मै तन्हा होता हूँ

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जब मैं तन्हा होता हूँ


तो बहुत कुछ आसपास होता 
ख्याल में सच मानो मैं तन्हा कभी नही होता बहुत कुछ याद आता है उसने क्यो कहा ऐसा क्यों किया वैसा 
जब मैं तन्हा होता हूँ 
तो कविता मेरे पास होती है गीत आगे पीछे चलती है कोई गजल में कानो में गूंज उठती है 
तब मैं तन्हा होकर भी बहुत व्यस्त होता हूँ
दो तरह के वक्त है 
जब मैं तन्हा होता हूँ
भविष्य और भूतकाल
ओर मैं 
वर्तमान होता हूँ
वर्तमान में वक्त के चक्रव्यूह में फंसा होकर भी निकल जाता हूँ और भविष्य को भी वर्तमान कर देता हूँ 
ओर मैं अकेला नही तुम साथ होते है
ओर तब तन्हाई में हम साथ साथ होते 
जब मैं तन्हा होता हूँ…बहुत कुछ आसपास होता है जैसे..
मैं तुम क्यो कैसे वैसे ऐसे कविता गजल कहानी और..वो Sanjivv Shaad

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