Home updates काव्य कुंज:-प्रसिद्ध हास्य कवि जगजीत सूफी साहब की कलम से…

काव्य कुंज:-प्रसिद्ध हास्य कवि जगजीत सूफी साहब की कलम से…

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मित्रो……

मैं जगजीत सूफी आज आपसे उन बातों की बात करना चाहता हूं जो आवाजें पिछले 50 साल से मेरे दिल और दिमाग को छूती रही है उन आवाजों का मेरे जीवन में आपके जीवन में एक अनुभव रहा होगा उदाहरण के तौर पर जब मैं पांच 1 साल का था तब एक आवाज आया करती थी भरी दोपहर में खील छोले मैं भागकर 10 का सिक्का लेकर उस पगड़ी धारी बुजुर्ग के पास दौड़ा चला जाता था उसके पास आवाज के जादू के साथ-साथ खील फुलिया गुड गट्टा गुड़ की पट्टी मेरे मोहल्ले के छोटे-छोटे दोस्त लेने को तत्पर होते थे एक आवाज मुझे याद आ रही है मेरी दादी की आवाज मेरी दादी जिनकी खाट मेरे घर के बाहर शाम के समय गर्मियों में बिजी रहती थी वह दादी जब पीले रंग का 20 का सिक्का मुझे दिया करती थी वह खुशी संभाले नहीं संभल की थी मुझे याद आ रही है वह आवाज एक चेहरे पर माता के दाल लिए माता के दाग लिए बूढ़ी माता जो हमारे घर से ले जाए गए मक्की के दानों को भूनकर हमें दिया करती थी और एवज में उन मक्खी के दोनों में से एक मुट्ठी काट लिया करती थी चलते हैं थोड़ा सा आगे मुझे बचपन में शौक था पांच पैसे 10 पैसे 20 पैसे इकट्ठे करने का जब आपके इस जगजीत सूफी के पास वह संख्या 20 या ₹30 तक पहुंच जाती थी मैं अपने तमाम हमउम्र साथियों को कट्ठा कर कर उन पैसों को अपने हाथ में दबाकर सभी दोस्तों को नीचे बिठाकर लुटाया करता था तो उस राजा महाराजाओं की अनुभूति आज तक पर नहीं भूल पाया नहीं भूलती है मुझे मेरे ननिहाल होशियारपुर में अपने मामा के लड़के की वह आवाजें जो अपने आप को बहुत दिलेर कहा करता था मैंने शरारत वश आपको भी याद होगा एक पटाखा बम की लड़ी आया करती थी मैंने अपने उस दिलेर भाई को हवा में चढ़ा कर यह कहा भाई तेरी दिलेरी का मजा तब है जब तू इन पटाखों को मुंह में डालकर माचिस की तीली दिखाएं उस सरल भाई ने उन पटाखों को मुंह में रखा और माचिस की तीली जला दी उसकी चीख भरी आवाज मुझे आज भी विचलित करती है ऐसा ही एक वाक्य 8 साल की उम्र में होशियारपुर मेरे ननिहाल में और घटित हुआ मेरे पास हमारे मामा की लड़की आई और बोलने लगी मम्मी को बिजली का करंट लग गया है मैंने स्वार्थी भाव में शहर भाव में कहा कि मैं क्या करूं मेरे मामा की लड़की बोली भैया करंट आपकी मम्मी को लगा है और उनके दो दांत टूट गए हैं इस आवाज को भी मैं आज तक भुला नहीं पाया एक और है आवाज मिक्की भैया की जिन्होंने मुझे शरारती बनने में महत्वपूर्ण योगदान दिया अगर मैं खुले दिल से कबूल करूं तो मैं उन्हें अपने गुरु के तौर पर मानता हूं शरारती के मामले में बातें बहुत है दोस्तों पर एक सांप्रदायिक एकता की बात में अपने परिवार की आपसे शेयर करना चाहता हूं बिना बात के झगड़े किए फिरते हैं हम तो अगर मैं अपने पर दादाजी का नाम याद करता हूं तो वह है वासुदेव सिंह दादाजी का शिवदेव सिंह पिताजी का रघुवीर सिंह मेरा जन्मपत्री में नाम दुर्गा सिंह और मेरे बेटे का नाम रमनदीप सिंह सभी नामों को अगर अर्थ दिया जाए तो हिंदू धर्म के भगवानों के नाम है यह दोस्तों एक बात में और नहीं भूल पाता छोटे होते हुए 10 साल की उम्र में एक लड़कियों का समूह जो रंग-बिरंगे पत्थरों से खेला करता था मैं लगातार दो दो घंटे टकटकी लगाकर उन्हें निहारता रहता मेरा निहारना शायद मेरे लड़का होने के कारण कहीं ना कहीं उन्हें उन्हें असहज करता था आवाज वह भी नहीं भूलती जो एक आंख वाले पक्के रंग के कुल्फी बेचने वाले का शायराना अंदाज मुनिया तेरी उड़ गई चुनिया इस अंदाज में उस आवाज का अपनी कुल्फी दे जाना अलग ही चेहरा था अलग ही ढंग था लगभग 4 फुट का वह बूढ़ा बाबा जिसके चूर्ण में से आग निकलती थी वह चूर्ण अभी भी मेरे मुंह में वही स्वाद भर गया है दोस्तों आपके पास भी ऐसी बहुत सी आवाजें होंगी जो आपने बचपन में सुनी होंगी पर आज भी कभी ना कभी आपके सपनों में आते होंगे वही चेहरे वही आवाजें जिनको कम से कम मैं तो भुला भी नहीं पाया और ना ही उन्हें बुलाना चाहता हूं इन यादों का छोटा सा थैला अपनी मां को याद करते हुए आपको पकड़ आता हूं मेरी मां के हाथों के बने हुए सूखे आलू जिसमें मात्र हल्दी डाली होती थी नमक डाला होता था आज तक उस सवाद को मैं ढूंढता फिर रहा हूं अपनी मां के इस दुनिया के जाने के बाद काश कहीं कोई बड़ा फाइव स्टार वह सवाद मुझे वापिस दिला दे दोस्तों ऐसी आवाजों को सहेज कर रखना अपने दिल में अपने दिमाग में मिलता हूं जल्दी ही कुछ और आवाजों के साथ खुश रहो यही दुआ है मेरी 
आपका अपना 
जगजीत सूफी अंबाला छावनी हरियाणा से

बात जब भी चलती है मेरे गांव की

बहुत याद आई मुझे पीपल की छांव की
कह रहा है उसका खामोश रहना
मिल गई सजा उसको उसके गुनाहों की
मंजिल को मकसद को पाने से पहले
गहराई नाप देखी है इन कातिल अदाओं की
है फटे हॉल दामन और चेहरे से सूफी
इन्हीं से उम्मीद रखना दिल की दुआओं की
 मां ने हाथों से पकाई रोटियां
मिट्टी के चूल्हे पर बनाई रोटियां
रखती थी किसी पुराने कपड़े में लपेटकर
बाद मुद्दत के याद आई रोटियां
रसोई से निकलकर सड़कों पर आ गई
जब दंगों के दिनों में खिलाई रोटियां
फुल्का चपाती से प्रसाद बन गई
जब मंदिर के भंडारे में बट वाइ रोटियां
अपने आप पर खूब शर्मसार हुई
जब भाई ने भाई से छिपाई रोटियां
घर आए मेहमान का पेट हम भर ना सके
जब मेरी बीवी ने गिन गिन कर पकाई रोटियां
पहले घर में आता था मेहमान
सोचते थे खिलाए रोटी
मक्खन लगाकर उसकी थाली में पकड़ाए रोटी
अगला मना करें फिर भी खिलाएं रोटी
आज का टाइम भी कोई टाइम है दोस्तों
अब तो यह सोचते हैं दिलबर जी
मेहमान चला जाए तो पकाई रोटी 
ज़िन्दगी ज़िंदाबाद…..


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