राकेश जैन: नाम-राकेश कुमार
जन्म तारीख-29 जून 1981
माता का नाम-श्रीमती विद्या देवी
पिता का नाम-स्वर्गीय-श्री डालचंद जैन
पत्नी का नाम-श्रीमती ज्योति जैन
बेटी का नाम-स्नेहा जैन(8वर्ष) व गीतिका जैन(6वर्ष-(दोनों बेटियाँ)
शिक्षा-बी.ए.हिन्दी आनर्स,एम.ए.लोकप्रशासन,डी.एड.
व्यवसाय-
सरकारी प्राथमिक अध्यापक(हरियाणा सरकार)
मोबाइल नंबर-9466539399
*प्रकाशित पुस्तकें*:-
पाँच साँझे काव्य संकलन,(चार काव्य के व एक लघुकथा का)
एकल काव्य- संग्रह- पहला प्रयास
साहित्यिक सम्मान/उपलब्धियां-
“भारत के युवा कवि एंव कवित्रियों में जे.एम.डी.पब्लिकेशन की तरफ से “श्रेष्ठ युवा रचनाकार सम्मान” व हिन्दी सागर सम्मान”?
पूर्वोतर हिन्दी अकादमी द्वारा शिलाँग में “लेखक मिलन एंव पर्यटन शिविर में”महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान”?
“कपिल मुनि कला मंच (हरियाणा)द्वारा राज्य स्तरीय नवोदित कवि सम्मेलन मे “नवोदित कवि सम्मान”?
साहित्य अकादमी पंचकुला(हरियाणा) एंव समग्र सेवा संस्थान द्वारा संयुक्त आयोजन में माँ सरस्वती देवी सम्मान?
साहित्य सृजन मंच(चतरा)द्वार “काव्य श्री सम्मान”से सम्मानित आदि?
विभिन्न मंचों पर काव्य पाठ व सोशल मिडिया (फेशबुक व व्हाट्सएप पर) ,लगभग चालीस बार सम्मानित??
✍️अनुज
राकेशकुमार जैनबन्धु
सरकारी प्राथमिक अध्यापक
रिसालिया खेड़ा,सिरसा
हरियाणा
विधा-दोहा
विषय-तालाबंदी
तालाबंदी हो गई , फंस गए मजदूर।
नहीं तड़पकर वे मरें,मदद करो भरपूर।
तालाबंदी ढ़ील को,मौज न समझें आप।
वायरस खड़ा सामने , देने को अभिशाप।
तालाबंदी मानिए , रख नियमों का ध्यान।
छिपा खड़ा है वायरस , बनकर के हैवान।
तालाबंदी हट गई , माँगे लोग शराब
परदा मुख का कीजिए,धोना हाथ जनाब
तालाबंदी दौर का, कर थोड़ा – सा भान।
दो गज की दूरी सही,रख ले इसका मान।
तालाबंदी दौर में,सखा हुए हैं ढ़ेर।
बाहर ढींगे हांकते,घर में भीगे शेर।
तालाबंदी हट गई,आप रखें सब ध्यान।
दो गज की दूरी सही,रहे सुरक्षित जान।
लघु कविता
.”काला पन्ना”
जी रहा हूँ मैं
आज सुकून से
हर पल
खुशी के पल हैं
निकाल फेंका मैंने
जिंदगी से
अतीत के उस
काले पन्ने को
जो दिल पर छोड़ गया
अपना निशां था।
“दोहा मुक्तक”
१.
खाकर रोटी देश की ,बनते नमक हलाल।
बेच रहे हैं देश को , बड़ा कमाते माल।
मंगाकर विष देश में , खिला रहे हैं आज।
करें खोखला देश को ,चलते हैं नित चाल।
२.
पैर बिवाई हैं फटी , चलने को मजबूर।
कातर नजरें कह रहीं,भटक रहे मजदूर।
हया-दया छू हो गई , नेता रोटी सेंक।
भरे शहर में खो गया , आनन सारा नूर।
३.
दिनकर गुस्से लग रहा , बदला तेरा रूप।
झुलसी काया देखकर , सोच धरा के भूप।
खेल-तमाशा छोड़कर,दे कुदरत का साथ।
दोहन करना छोड़ दे , नहीं लगेगी धूप।
लघु कविता
.”मौत का सामना”
खटकता रहा हरदम
मेरी आँखों में वो
जहरीले विष की तरह
डस लिया आज
उसे सच में जहरीले नाग ने
आँखें नम हों गई मेरी
मौत देखकर उसकी
और उतर गया सारा जहर
मेरी आँखों से।
दोहा गितिका
“नारी हो बलवान”
नारी का इस देश में,कुछ करते अपमान।
पुरुषों को प्यारा रहा,अपना निज सम्मान
चीरहरण का वाकया, होगा तुमको याद।
भरी सभा इज्जत गई, गई अबला आन।
रोज सुता है कोसती,कैसा चला विधान
मुझे पराया बोलते , बेटा कहे प्रधान।
हवस पुजारी बढ गए , करते अत्याचार।
बेटी अस्मत लूटकर , आज बने हैवान।
दहेज लोभी गा रहे,आज लाभ का राग।
बोल मौत के बोलकर ,रोज सुनाए तान।
नारी पीड़ा देखकर,दहला दिल है आज।
ईश्वर माया तुम रचो , नारी हो बलवान।
मुक्त छंद
“लिबास”
बेच दिया ईमान सबने
रद्दी में ईमानदारी फैंककर
टूटी हुई कलम से
आज नसीब वो अपना लिखने लगे हैं
बदल गया है देश अपना
बदल गया है समाज
बिल्डिंग बनने लगी है सीमेंट की
दिल पत्थर के बनने लगे हैं
घिरा देखकर मुझे
दुश्मनों की बस्ती में
बदल गए हैं दोस्त भी
चाल सियार सी आज वो चलने लगे हैं
शराफत को हाथ में लेकर
घूम रहा हूँ आज चोरों की बस्ती में
बिगड़े लिबास हैं जिनके
वो सरे आम इज्ज़त नीलाम करने लगे हैं
खड़ा था ईमान की चौखट पर कभी
अब उलझी है दिल की डोर मेरी
सुलझेंगी या नहीं
लिबास सब अपना बदलने लगे हैं
[6/11, 14:29] Kk राकेश जैन: मुक्त छंद
“ईश ने नवाजा”
दो आँसू पौंछ दिए
किसी गरीब के
तो गिनना,गिनाना क्या
मैं हकदार नहीं हूँ
इस कृत्य का
इस बड़प्पन का
था ईशारा भर
मेरे दिल के जज्बातों को
कुरेदने का
देखी,सुनी जब मैंने
दास्तां गरीबी की
तो चिराग जल उठा दरियादिली का
कुछ आँसू ही पौंछे हैं मैंने
जरूरतमंद के
मैं पात्र नहीं शुक्रिया का
पर शुक्रगुजार हूँ ,ईश आपका
नवाजा आपने मुझे
इस कृत्य के लिए………
ज़िन्दगी ज़िंदाबाद
तार सुर के न जोड़ सके हम
दर्द के नगमें यूँ ही गाते रहे
भरी दुनिया में रह गए अकेले
पत्थर दिल हमें रुलाते रहे
राकेशकुमार जैनबन्धु



