सप्तक रोहतक द्वारा अब तक इस नाटक का भारत के विभिन्न शहरों के अलावा पाकिस्तान के लाहौर में भी मंचन किया जा चुका है।

रोहतक। स्थानीय सप्तक कल्चरल सोसायटी के कलाकारों द्वारा अभिनीत नाटक “गधे की बारात” का उदयपुर के शिल्पग्राम में रिकॉर्ड 345वां मंचन किया गया। दर्शकों से ठसाठस भरे दर्पण सभागार में प्रस्तुत इस नाटक का आयोजन पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर द्वारा निदेशक फुरकान खान के मार्गदर्शन में किया गया। गौरतलब है कि सप्तक द्वारा अब तक इस नाटक का भारत के विभिन्न शहरों के अलावा पाकिस्तान के लाहौर में भी मंचन किया जा चुका है। हरियाणा के किसी ग्रुप द्वारा किया गया यह पहला हिंदी नाटक है जिसके 345 मंचन हुए हैं।

हरिभाई वडगांवकर द्वारा मूल रूप से मराठी में लिखे गए इस नाटक का निर्देशन विश्व दीपक त्रिखा ने किया। इसका हिंदी रूपांतर राजेंद्र मेहरा और रमेश राजहंस ने किया। डब्ल्यूजेडसीसी की मासिक नाट्य संध्या के अंर्तगत आयोजित इस नाटक में कल्लू कुम्हार की मुख्य भूमिका में अविनाश सैनी ने दर्शकों की खूब सराहना बटोरी। गंगी की भूमिका में पारुल आहूजा, बृहस्पति गुरु और चौपट राजा की भूमिका में डॉ. सुरेंद्र शर्मा तथा दीवान की भूमिका में तरुण पुष्प त्रिखा ने भी प्रभावित किया। शक्ति सरोवर त्रिखा (इंद्र), अमित शर्मा (चित्रसेन), प्रतिष्ठा (अप्सरा रंभा एवं राजनर्तकी), खुशी (राजकुमारी), अनिल शर्मा (द्वारपाल) और प्रेरणा (बुआ जी) की अदाकारी भी देखने लायक रही। हरियाणा के प्रसिद्ध नगाड़ावादक सुभाष नगाड़ा के संगीत से सजी इस प्रस्तुति में विकास रोहिल्ला ने हारमोनियम के साथ साथ गायकी के भी रंग बिखेरे। नलिनी, छोटीबाई, वंशिका ने बरातियों की भूमिका निभाई। मेकअप अनिल शर्मा का रहा। कार्यक्रम का संचालन केंद्र के सहायक निदेशक दुर्गेश चांदवानी ने किया।

गधे की बारात नाटक एक पौराणिक कथा पर आधारित है। इंदर देव के दरबार में अप्सरा रंभा नृत्य कर रही है। तभी चित्रसेन गंधर्व सुरा के नशे में अप्सरा रंभा का हाथ पकड़ लेता है। इंद्र गुस्से में आकर इसको श्राप देता है कि वह मृत्यु लोक में गधा बनकर भटकेगा। जब गंधर्व माफी मांगता है तो इंद्र उसको वरदान भी देता है कि जब उसकी शादी वहां के एक राजा की लड़की से होगी तब वह श्राप से मुक्त हो जाएगा।

चित्रसेन पृथ्वी पर गधा बनकर कल्लू कुम्हार के घर में रहने लगता है। कल्लू कुम्हार उसकी बहुत सेवा करता है। एक दिन राजा मुनादी करवाता है कि जो कोई भी एक रात में महल की ड्योढ़ी से मुफलिसों की बस्ती तक पुल बनाएगा राजकुमारी की शादी उसके साथ की जाएगी। गधा बना गंधर्व चित्रसेन इस शर्त को पूरा कर देता है और पुल बना देता है। अब राजा की परेशानी बढ़ जाती है की गधे के साथ अपनी बेटी की शादी कैसे करें लेकिन क्योंकि वादा किया हुआ था तो शादी करनी पड़ती है लेकिन जैसे ही जयमाला डालते हैं, गंधर्व अपने वास्तविक रूप में आ जाता है और अपनी असलियत बताता है। लेकिन इंसान बनते ही वह अपने पालने पोसने वाले कल्लू कुम्हार व गंगी को पहचानने से भी इंकार कर देता है। कल्लू कहता है कि वह तो उसका बाप हूं जिसने उसे पाला पोसा है लेकिन गंधर्व उसको दुत्कार देता है। कल्लू रोता है लेकिन उस गरीब की कोई नहीं सुनता। कहते हैं न, अमीर अमीर ही रहता है और गरीब गरीब ही रहता है, और कोई गरीब अगर अमीर बन जाता है तो वह अपने संगी साथियों को बिल्कुल ही भुला देता है। हास्य व्यंग्य से भरपूर यह नाटक अपनी बात कहने में पूरी तरह सफल रहा।
अविनाश सैनी।

