गली गली
नगर नगर
इक बात चली
बात
कुछ भी नही
बस बात उठी थी
बात बनी थी
उन दोनों की नही
जिनके बारे में फैली थी
बात ही कुछ ऐसी थी
कुछ लोगो ने कहा
नही वैसी थी
कुछ ने पूछा
बोलो न वो बात कैसी थी
वो छुपाया नही छुपता
मुख से तो कुछ
भी
बोला न था
बोले थे नयन सावरे
समझे थे
पिया
बावरे
फिर क्या बात उडी थी
इक ने दूसरे तक
दूसरे ने तीसरे तक
इक बात
की 100 बना के कही थी
चुपचाप सुनसान सहमी सी डरी सी
इक बात उसने मुझ से कही थी
की
लोग
बाते मारते हुए अनेको बातो को जन्म देते है
हम मौन हुए
इक दूसरे के लिए कौन हुये
शायद पहले भी
कोई बात नही नही थी
अब भी कोई बात नही
आप शायद ये सोचे
ताली कभी भी नही बजती इक हाथ से
जरूर इस बात के पीछे भी कोई बात होगी
अंधे ने देखि
बहरे ने सुनी
और
गूंगे ने कही
और लगड़ी बात
दूर तक चलती रही
मरती रही
अनेको बातो को जन्म देती
वर्षो बीत जाने के बाद भी
वो बात
मरी नही
जिंदा है……….जो उसने……..
सिर्फ मुझ से कहा था
विदा होने से पहले …………….shaad
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