सी.बी.एस.ई. द्वारा जारी नवीन परिपत्र के अनुरूप देशभर के विद्यालयों में शिक्षकों के कौशल-विकास हेतु प्रेरक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसी श्रृंखला में बाल मंदिर स्कूल में “Capacity Building Programme on Value- Education” (मूल्य शिक्षा पर क्षमता निर्माण कार्यक्रम) पर आधारित एक दिवसीय शिक्षक–प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन उत्साह, सकारात्मक ऊर्जा एवं शिक्षण नवाचारों से भरपूर वातावरण में किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय के शैक्षणिक सलाहकार श्री सुरेंद्र कुमार कौशिक ने रिसोर्स पर्सन मैडम तृप्ता बजाज (प्रिंसिपल, बी.जी.एन.ए. पब्लिक स्कूल, वी.पी.ओ. भगवानगढ़, बठिंडा) तथा मैडम मैरी एंटनी सिंह (प्रिंसिपल, माउंट लिटेरा ज़ी स्कूल, बठिंडा, पंजाब) का हार्दिक स्वागत कर किया।
शैक्षणिक सलाहकार श्री कौशिक ने दोनों अतिथियों के शिक्षण-दर्शन, विनम्र व्यक्तित्व, और व्यापक अनुभव की सराहना करते हुए कहा कि यह दिन शिक्षकों के लिए नई सोच , नई विधियों और नई ऊर्जा को आत्मसात करने का श्रेष्ठ अवसर लेकर आया है।
कार्यशाला के आरंभ में रिसोर्स पर्सन ने संतुलित परवरिश का संदेश देते हुए कहा कि अत्यधिक लाड़-प्यार बच्चों की आत्मनिर्भरता रोकता है, इसलिए उन्हें चुनौतियों का सामना करने और स्वयं निर्णय लेने के अवसर देने चाहिए। इसके बाद, शिक्षकों ने अपनी सकारात्मक खूबियाँ साझा कीं, जिसका उद्देश्य आत्म-पहचान और आत्मविश्वास को बढ़ावा देना था
रिसोर्स पर्सन ने अभिभावकों की उन सामान्य चिंताओं पर भी चर्चा की, जिनमें वे अक्सर शिकायत करते हैं कि बच्चे उनकी बात नहीं सुनते, मोबाइल फोन पर अधिक समय बिताते हैं और पढ़ाई में पर्याप्त रुचि नहीं लेते। इस संदर्भ में उन्होंने बताया कि केवल रोक-टोक या डांट-फटकार से समस्या का समाधान नहीं होता। बच्चों के साथ संवाद स्थापित करना, उन्हें समय देना, उनकी रुचियों को समझना तथा मोबाइल के संतुलित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग के लिए मार्गदर्शन देना अधिक प्रभावी उपाय हैं। उन्होंने कहा कि जब घर और विद्यालय मिलकर सकारात्मक वातावरण का निर्माण करते हैं, तब बच्चों के व्यवहार और आदतों में सार्थक परिवर्तन लाया जा सकता है।
कार्यशाला के दौरान अध्यापक और विद्यार्थियों के बीच सकारात्मक संबंधों के महत्व पर भी विशेष चर्चा की गई। रिसोर्स पर्सन ने बताया कि शिक्षक का व्यवहार, शब्द और दृष्टिकोण सीधे बच्चों के व्यक्तित्व एवं सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। सकारात्मक वातावरण बच्चों में आत्मविश्वास, उत्साह और सीखने की रुचि बढ़ाता है, जबकि नकारात्मकता उनके मनोबल और प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
उन्होंने यह भी बल दिया कि शिक्षकों को अपनी व्यक्तिगत (Personal) और व्यावसायिक (Professional) जीवन की परिस्थितियों को अलग रखना चाहिए। व्यक्तिगत तनाव या समस्याओं का प्रभाव कक्षा-कक्ष के वातावरण पर नहीं पड़ना चाहिए। एक संतुलित, शांत और सकारात्मक शिक्षक ही विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है तथा मूल्यपरक शिक्षा के उद्देश्यों को सफलतापूर्वक पूरा कर सकता है।
‘Just a Minute’ गतिविधि में शिक्षकों ने ईमानदारी, सहानुभूति, अनुशासन, देशभक्ति एवं पर्यावरण संरक्षण जैसे मूल्यों पर अपने विचार साझा किए। इस गतिविधि ने मूल्य शिक्षा के महत्व को समझने तथा उसे व्यावहारिक जीवन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
‘Together We Can’ गतिविधि में एक प्रेरक कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि सच्ची प्रगति तभी संभव है जब हम स्वयं के साथ-साथ दूसरों की उन्नति में भी योगदान दें। गतिविधि ने सहयोग, आपसी सम्मान और सामूहिक विकास के मूल्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
प्रशिक्षण सत्र के अंतर्गत शिक्षकों ने विभिन्न विषयों से संबंधित चयनित विषयों पर रोल-प्ले प्रस्तुत किए। इस गतिविधि का उद्देश्य शिक्षण को अधिक रोचक, प्रभावी एवं सहभागितापूर्ण बनाना था। प्रस्तुतियों के माध्यम से गतिविधि-आधारित शिक्षण, रचनात्मकता, संचार कौशल तथा विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देने के उपायों पर प्रकाश डाला गया।” रिसोर्स पर्सन के अनुसार शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि छात्र का सर्वांगीण विकास करना है। स्कूल के दिन किसी भी व्यक्ति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होते हैं, क्योंकि इस दौरान सीखे गए संस्कार और दृष्टिकोण ही भविष्य के जीवन की मजबूत नींव बनते हैं। वर्तमान स्कूली शिक्षा का व्यापक लक्ष्य विद्यार्थियों को केवल परीक्षाओं के लिए नहीं, बल्कि व्यावहारिक वयस्क जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करना है। मूल्य शिक्षा के माध्यम से ही छात्रों में सही और गलत की पहचान करने की समझ विकसित होती है। अंततः, इसका अंतिम लक्ष्य समाज को ऐसे संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक सौंपना है जो देश की उन्नति में सकारात्मक योगदान दे सकें।
रिसोर्स पर्सन ने बताया कि सोशल मीडिया बच्चों के लिए एक दोधारी तलवार जैसा है। सही उपयोग करने पर यह पढ़ाई, ज्ञान और नई चीजें सीखने का बेहतरीन जरिया बनता है। वहीं दूसरी ओर, इसका दुरुपयोग बच्चों को पढ़ाई से भटकाता है और उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को इस पर पूरी तरह रोकने के बजाय उन्हें इसका संतुलित और ज़िम्मेदारी से इस्तेमाल करना सिखाना है। ‘रीजन फॉर मिसबिहेवियर’ विषय पर विशेष सत्र में यह समझाया गया कि कुछ विद्यार्थी शरारती या अव्यवस्थित व्यवहार क्यों करते हैं। रिसोर्स पर्सन ने बताया कि ऐसे व्यवहार के पीछे ध्यान आकर्षित करने की चाह, भावनात्मक असंतुलन, घर का वातावरण, असुरक्षा, आत्मविश्वास की कमी अथवा सीखने में कठिनाई जैसे कारण हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि शिक्षक बच्चों के व्यवहार के पीछे छिपी भावनाओं को समझ लें, तो वे अधिक संवेदनशीलता और धैर्य के साथ उन्हें सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि यदि शिक्षक स्वयं मानसिक रूप से संतुलित, सकारात्मक एवं प्रसन्न रहेंगे, तो वे विद्यार्थियों के जीवन में भी उत्साह, ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार कर पाएँगे।
कार्यशाला में यह भी बताया गया कि बच्चों में सकारात्मक व्यवहार विकसित करने के लिए उन्हें जिम्मेदारियाँ सौंपना, उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की सराहना करना, विश्वास देना और सुरक्षित एवं सहयोगात्मक वातावरण प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है। पोस्टर मेकिंग, चार्ट मेकिंग, समूह चर्चा एवं समूह गतिविधियों जैसी विधियाँ विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करती हैं तथा कक्षा के वातावरण को आनंददायी एवं सहभागितापूर्ण बनाती हैं। सत्र के दौरान यह चर्चा भी हुई कि शिक्षक कक्षा-कक्ष एवं स्टाफ रूम दोनों में अनेक चुनौतियों का सामना करते हैं—जैसे विद्यार्थियों का ध्यान भटकना, भावनात्मक अस्थिरता, धीमी सीखने की गति, अनुशासन बनाए रखना, समय प्रबंधन, पाठ योजना एवं विभिन्न गतिविधियों का समन्वय। इन चुनौतियों के समाधान हेतु सकारात्मक दृष्टिकोण, प्रभावी संवाद, पारस्परिक सहयोग एवं माइंडफुलनेस तकनीकों को अत्यंत उपयोगी बताया गया।
कार्यशाला में यह भी रेखांकित किया गया कि केवल शिक्षक ही नहीं, बल्कि अभिभावक भी बच्चे के संपूर्ण विकास में समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अभिभावकों को बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने, उनकी भावनाओं को समझने तथा उन्हें उचित संस्कार एवं सकारात्मक वातावरण देने की प्रेरणा दी गई।
कार्यशाला के अगले चरण में रिसोर्स पर्सन ने इस बात पर भी महत्व दिया कि शिक्षक राष्ट्र निर्माता होते हैं। किसी भी बच्चे की सफलता केवल एक व्यक्ति के अकेले प्रयास से नहीं होती जब शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर समग्र भूमिका निभाते हैं तभी वास्तविक सफलता मिलती है और इस बात को समझना भी आवश्यक है कि हर बच्चे का शत -प्रतिशत अंक लाना जरूरी नहीं है। अंकों की दौड़ से कहीं महत्वपूर्ण है कि वह एक बेहतर और अच्छा इंसान बने। बच्चों के भीतर नैतिकता संवेदनशीलता और मानवीय गुणों का विकास करना ही सच्ची शिक्षा है। उन्होंने शिक्षकों को यह भी समझाया कि हमें किसी भी बच्चे के प्रति अपने मन में पहले से कोई पूर्वाग्रह नहीं बनना चाहिए ।यदि कोई बच्चा स्वभाव से शरारती है तो हमें उसे हमेशा के लिए “बिगड़ा हुआ” या “लापरवाह” नहीं समझ लेना चाहिए।पूर्वाग्रह रखने से हम बच्चे की अच्छाइयाॅं और उसके सुधारने की संभावना को देखना बंद कर देते हैं इसलिए एक शिक्षक के रूप में हमारी जिम्मेदारी है कि हम पुरानी धारणाओं को छोड़कर हर बच्चे को खुले मन से समझें और उसे सही दिशा प्रदान करें।
सेमिनार में रिसोर्स पर्सन ने हेलिक्स डोमेन के बारे में भी बताया कि किताबी ज्ञान (पढ़ाई) और नैतिक मूल्य (संस्कार) दो अलग चीजें नहीं हैं, बल्कि आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को यह समझाना था कि शिक्षा को केवल डिग्रियां देने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि बच्चों को विषय पढ़ाने के साथ-साथ अच्छे मानवीय गुण भी सिखाए जाएं। जब ज्ञान और संस्कार दोनों को एक साथ मिलाकर दिया जाता है, तभी बच्चों का वास्तविक विकास होता है और वे जीवन में सफल होने के साथ-साथ एक बेहतर इंसान बनते हैं।
अपने प्रेरक उद्बोधन में शैक्षणिक सलाहकार श्री सुरेंद्र कुमार कौशिक ने कहा कि “शिक्षक वह दीपक है जो समाज की दिशा बदलने की क्षमता रखता है।” उन्होंने कहा कि आज शिक्षण केवल पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि बच्चों में जीवन-कौशल, सकारात्मक सोच, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का विकास करना है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम शिक्षकों के दृष्टिकोण को व्यापक बनाते हैं तथा उन्हें आधुनिक, रचनात्मक और मूल्यपरक शिक्षण विधियाँ अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
कार्यक्रम के अंत में शैक्षणिक सलाहकार श्री सुरेंद्र कुमार कौशिक ने दोनों रिसोर्स पर्सन एवं सभी सहभागी शिक्षकों के प्रति आभार व्यक्त किया तथा आशा जताई कि इस प्रशिक्षण से विद्यालय की शिक्षण प्रक्रिया और भी अधिक अर्थपूर्ण, प्रभावी एवं विद्यार्थी-केंद्रित बनेगी।
एक दिवसीय यह कार्यशाला अनुभवों, आत्मचिंतन, संवेदनशीलता, नवाचार एवं सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रही, जिसने सभी शिक्षकों को शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य—“मूल्यों के साथ व्यक्तित्व निर्माण”—की ओर पुनः प्रेरित किया।

