सियासत से सवाल करते हो
तुम भी यार, कमाल करते हो
राजेश कुमार
संक्षिप्त परिचय
राजेश कुमार 8168355513
पिता का नाम – श्री सुरेश कुमार
माता का नाम – श्रीमती इंद्रावती देवी
शिक्षा – एम.ए. बी.पी.ऐड.
व्यवसाय – पीजीटी शारीरिक शिक्षा
स्कूल – रा.व.मा. विद्यालय सुंगरपुर
जिला – भिवानी
प्रशिक्षक – कबड्डी
संचालक –
शहीद लेफ्टिनेंट धर्मबीर सिहाग कबड्डी एकेडमी
लौट आएंगे
तिरपाल में रहके , तेरे मकां बनाएंगे
जरा छालो को सूखने दो, हम लौट आएंगे ।
भुख रोटी की, खींच लाई है, कहां कहां
मरने को तो अ मिट्टी, हम तेरे पहलू में आएंगे।
ऐ “सियासत” तुम फिर हमारे पैर चुमोगी
जब भी तेरे शहर में, चुनाव के दौर आएंगे।
बदलने को बस चेहरे बदलते हैं, हालात नही
तुम नया नकाब ले आना, हम फिर बहल जाएंगे।
दर्द बस इतना है, मेरे अपनो ने,अपना नही समझा
खैर छोड़ो, “राज” जंग हम , ये भी जीत जाएंगे।
“नुकसान किसका है”
इबादत , मज़हब, सियासत, नाम किसका है
मेरे देश को जलाने का , ये काम किसका है
हम भी शरीक हैं हमारे घरौंदे जलाने में
नस्लों पे आखिर, ये इल्जाम किसका है
मुतमईन हैं कौंन , मेरा गुलिस्तां उजाड़ने के
ये फूलों को बर्बादियों का, पैग़ाम किसका है
“फैलेगी” तो आएंगे तुम्हारे घर भी जद में
आग को कहां मालूम के , मकान किसका है
हवाएँ बदलेगी भी मगर, दिलो के तार टूट जाएंगे
“राज” तुम क्या जानो , ये नुकसान किसका है
मजदूर
सियासत से सवाल करते हो
तुम भी यार, कमाल करते हो
तुम भूख से मर भी गए तो क्या है
छोटी छोटी बातों पे, क्यों बवाल करते हो
तुम ही थे जो बंटे थे ,धर्मो में ,जातियों में
फिर अब , किस बात का मलाल करते हो
मांगते हो रोटी , कपड़ा, मकान
तुम इतनी बड़ी मजाल करते हो
तुम्हारा कुसूर बस इतना सा है “राज”
तुम अब भी , इस माटी का ख्याल करते हो।
काश मै,फिर से , जिन्दा हो जाऊं
ऐसे उड़ूँ के परिंदा हो जाऊं
मुझे मालूम है, तेरा मुजरिम हूँ मै
मगर,यूँ न देख , के शर्मिंदा हो जाऊं
डोर सी हो गयी है फितरत आजकल
कहीं लिपटु, कही उडूं, कहीं फंदा हो जाऊं।।
जूठी ही सही, मुझसे, दुआ-सलाम तो रख
न जाने कब मै, तेरे शहर का बाशिन्दा हो जाऊं
सुना है बाद मरने के, कुछ लोग याद बहुत आते हैं
“राज” जाने कब मै भी, चुनिंदा हो जाऊं
कौन पूछता है अपना हाल, माँ तेरे जाने के बाद
खुद से ही तो करने हैं सवाल, माँ तेरे जाने के बाद
हर बार जब गिरता हूँ, तो उठ भी जाता हूँ
खुद रखने लगा हूँ अपना ख्याल, माँ तेरे जाने के बाद
चूल्हा भी वही है, आटा भी वही, पेट भी भर जाता है
नही है तो बस हाथो का वो कमाल, माँ तेरे जाने के बाद
आसूं अब खुद ही पोंछ के सो जाता हूँ अक्सर
किस को बताऊ अपना हाल, माँ तेरे जाने के बाद
ऎसा नही की तकलीफ़े सह नही पाता हूँ अब
गोद में सर रखने का रह जाता है मलाल, माँ तेरे जाने के बाद
कभी दुआ, तो फरमाइश सी लगी,
ये जिंदगी हमको आजमाइश सी लगी,
बदलते वक़्त ने बहुत बदल लिया खुद को
जिंदगी फिर भी लम्हों की पैमाइश सी लगी।
दिलों के गर्द को छुपाने में खर्चा बहुत हुवा
हकीकत के आयने में जिंदगी नुमाइश सी लगी।
हम पुराने रिस्तो पे लगते रहे, पैबंद नए नए
हर नए रस्ते पे मगर, दर्द की पैदाइश सी लगी ।
कभी जिंदगी देती रही जीने के बहाने हमको,
“राज” कभी जिंदगी बस अंजाम की, ख्वाहिश सी लगी ।




Unknown
June 13, 2020 at 4:05 pm
मेरी रचनाओं को स्थान देकर , आपने जो सम्मान दिया है, उसके लिए आपका दिल से धन्यवाद।
Unknown
June 13, 2020 at 4:05 pm
मेरी रचनाओं को स्थान देकर , आपने जो सम्मान दिया है, उसके लिए आपका दिल से धन्यवाद।