भोली
है नटखट है
रूठती है पर मान जाती है
उसकी हर शरारत
मन को छु जाती है
बेटी है
जो घर को घर बनती है
आँखों के सामने मेरे
कितने किरदार निभाती है
अपनी हो कर भी पराई बन जाती है
अब वो कभी कभी
आती है
दुःख दर्द पूछ के जाती है
शुक्र है
वो मुस्कराती है
और आपने साथ अपनी ही
हम शक्ल
छोटी सी बेटी लाती है
मेरे घर आँगन में
वर्षो बाद
इक कहानी लौट आती है
वो भी
भी भोली है नटखट है
रूठ के मान जाती है………….
दो चार दिन
रह
कर आखिर वो भी चली जाती है ….
अब तो कलम है हाथ में
और उसकी यादें
इक कविता बन
कर रोज
ख़याल में आती है
और ख्बाव बन के छुप जाती है।।
2 Comments
ख़याल और ख्बाव
भोली
है नटखट है
रूठती है पर मान जाती है
उसकी हर शरारत
मन को छु जाती है
बेटी है
जो घर को घर बनती है
आँखों के सामने मेरे
कितने किरदार निभाती है
अपनी हो कर भी पराई बन जाती है
अब वो कभी कभी
आती है
दुःख दर्द पूछ के जाती है
शुक्र है
वो मुस्कराती है
और आपने साथ अपनी ही
हम शक्ल
छोटी सी बेटी लाती है
मेरे घर आँगन में
वर्षो बाद
इक कहानी लौट आती है
वो भी
भी भोली है नटखट है
रूठ के मान जाती है………….
दो चार दिन
रह
कर आखिर वो भी चली जाती है ….
अब तो कलम है हाथ में
और उसकी यादें
इक कविता बन
कर रोज
ख़याल में आती है
और ख्बाव बन के छुप जाती है।।
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Unknown
September 10, 2015 at 11:49 am
Khyalo se bhari, zindagi Ki dasta… ?
Unknown
September 10, 2015 at 11:49 am
Khyalo se bhari, zindagi Ki dasta… ?