मेरे नाटक तिनके का एक डायलॉग
दस्तक है बदलाव की लेकिन….
शर्त है हाथ खुद का हो और जुबान भी खुद की हो….
खुद उठना पड़ेगा …सबसे पहले खुद के खिलाफ ..
.एक यद्ध …
विचार भी होंगे
नही हो सकेगा
कैसे होगा
अकेला क्या कर सकता हूँ
क्या फर्क पड़ता है
मुझे क्या जरूरत
लोग समझते नही
लोग क्या कहेंगे
ऐसे नही ऐसे होना चाहिए
जैसे शब्द वाक्य मेरे दिमाग मे खड़े है इसलिए मेरी शक्ल चमचे जैसी नज़र आती है .. आईना देख कर एक ख्याल आया कॉस्ट्यूम डाले जो मिला उससे उसी की बात की चहेरे पे चहेरा लगा कर बढ़िया ब्रेकफास्ट करके निकल पड़ा हूँ बाज़ार …भीड़ में मुझे मेरे जैसे चहेरे मिले … शाम को जब मै घर लौटा तो दर्पण मुस्करा कर बोला तुझ में एक आदमी है तनी हुई मुठ्ठी वाला उसे जिंदा करो खुद को मार कर… TV की खबरे मेरी रोटी का जायका नही बदलती रिमोट मेरे हाथ मे है चेनलो की चाल भरी भीड़ में मुझे पता नही चला कि कब मै इतना कुछ सुन कर सो गया सवेरे उठ कर दीवार पे लटके हुए शीशे के सामने जाने की हिम्मत नही हुई …एक आईना सब के पास होता है बस हिम्मत नही होती देखने की
हो गई है पीर पर्वत पे अब पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चहिये @shaad




Unknown
June 14, 2020 at 5:26 am
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Unknown
June 14, 2020 at 5:26 am
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