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काव्य कुंज:-सुरेश बरनवाल

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नाम- सुरेश बरनवाल


संक्षिप्त परिचय-
जन्मतिथिः 15 अगस्त 1970
शिक्षाः स्नातक (विज्ञान)
संप्रति- असिस्टेन्ट मैनेजर] सर्व हरियाणा ग्रामीण बैंक
प्रकाशनः
*कहानी संग्रहः संवेदनाओं संग संवाद (2010)
*कविता संग्रहः कतरा कतरा आसमां  (2015)
*कादम्बिनी] आजकल] देस हरियाणा] हरिगंधा] मधुमती] राष्ट्रदूत] शब्दिता] बालहंस] दैनिक नवज्योति] राष्ट्रधर्म] सेतू] अर्यसंदेश] शब्दशक्ति] त्रिवेणी] शुभ तारिका व अन्य पत्र-पत्रिकाओं में कहानी] लघुकथा] कविता] गजल] लेख] बालकविता।
*कथादेश] हंस] इतिहास बोध व अन्य पुस्तकों में स्वरचित चित्र प्रकाशित।

विशेषः
*कहानी संग्रह काशी विद्यापीठ के पाठ्यक्रम में शामिल।
*कहानी ‘सैनिक और बन्दूक को 2005 में भारत सरकार द्वारा आयोजित अखिल भारतीय युवा कहानीकार प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त।
*कहानी ‘अस्थि विसर्जन को हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता 2014 में तृतीय स्थान प्राप्त।
*विभिन्न कहानियों पर मंचन व रेडियो नाट्य प्रसारण।
*आकाशवाणी द्वारा कविता प्रसारण।

*कुछ कविताएँ

मजदूर बनाम राष्ट्र 

यह भी तो एक युद्ध है
कि एक मजदूर
दिन भर की दिहाड़ी के बाद
आधा राशन लिए 
थका हारा घर लौटता है।
उसके बच्चे 
हर रोज युद्धभूमि में उतरते हैं
हसरतों को मारते हैं
और खुद थोड़ा थोड़ा मरते हैं
यह ऐसा युद्ध है
जिसमें
दो राष्ट्र तो नहीं लड़ते
पर एक राष्ट्र 
फिर भी हार जाता है।



उदास दुनिया

कल की रात बहुत गीली थी
तुम उदास थीं क्या
चलो सूरज की दीवार पर
कल की रात को कुछ देर बिछा दें
तुम अपनी हथेलियों को खोल लेना
जो धूप तुम्हारे उंगलियों के बीच से छन कर आएगी
हो सकता है वो सुब्हा लाए
जो सोख ले उदासी का गीलापन।
इस रात का
और तमाम उदास रातों का गीलापन सूखना
बहुत जरूरी है 
मुझे उदास दुनिया अच्छी नहीं लगती दोस्त।



       हादसा

आदमी एक हादसा है
आदमी में
आदमियत का खत्म होना
एक और हादसा है
और किसी आदमी को
इसका अफसोस तक न होना
सबसे बड़ा हादसा है।

 प्रेम
—–
किसी चट्टान की
खुरदुरी सतह पर उभरी
किसी दरार पर
हौले से अपना हाथ यूं रखो
मानो पूछ रहे हो 
उससे उसकी खैरियत।
तुम देखना
कुछ वर्ष बाद 
वहां कोई कांेपल फूट गई होगी
अथवा
उस दरार में
पानी के निषान होंगे।

सागर
——
मैंने जब-जब सागर को देखा
वह विस्तार करता गया
और महासागर बन गया।
मैंने जब-जब सागर से आंखें धोईं
वह खारा होता गया
और नमक हो गया।
मैंने जब-जब सागर को दिखाया
अपने घर की छत पर 
चिड़ियों के लिए रखा
कटोरी में थोड़ा सा जल
सागर पानी-पानी हो गया।

प्रेम और युद्ध
———-
तुम्हारे पास युद्ध है
मेरे पास प्रेम।
आओ बदल लें
तुम प्रेम ले लो
महक जाओ
और हवा बन जाओ
मैं युद्ध लूंगा
उसे पी जाऊंगा
और पानी बन जाऊंगा।
तुमने जहां-जहां रक्त फैलाया है
मुझसे धो देना
और अपने हाथों से क्यारियां बना
उनमें प्रेम बो देना।

भीतर के ग्रन्थ
———-
भीतर एक ग्रन्थ है
मेरे भी
तुम्हारे भी।
ग्रन्थ को छूने मात्र से
इसके कुछ पृष्ठ
अनायास पलट जाते हैं
कुछ पढ़े जाते हैं
कुछ अनछुए रह जाते हैं।
कुछ पृष्ठ
हम दोनों के ग्रन्थ में एक से हैं
संवेदनाओं से भीगे,
स्नेह से सिंचित,
प्रेम से सराबोर।
स्पर्श किए जाने की आस में
यह पृष्ठ खुद फड़फड़ाते हैं।

चलो! इन पृष्ठों को पढ़ते हैं
तुम मेरे ग्रन्थ को पढ़ो
मैं तुम्हारे।

दूरी  
—-                                                  
मैं
अपने घर की छत से 
निहारा करता सितारे
और आंखों से नापता 
जमीन से उनकी दूरी को
फिर बेबस हो 
बैठ जाता था। 

एक दिन मैंने देखा
अपने तीन साल के बेटे को
चांदनी रात की बेला में
चांद को निहारते 
और अपने पैरों पर उचककर
उसे लपकने की कोषिष करते
बार-बार।

मुझे लगा
इतना भी दूर नहीं आकाष।

उजाले-अंधियारे
———–
मेरे घर के कोने में
उजाला और अंधियारा
और उनकी बातें,
उनका सहयोग,
उनकी टकराहट
रहती थीं सदियों से।
दोनों ने छिपा रखा था
अपना ठिकाना
और मुझे पता न पड़ता था।

वह दोनों 
मेरे घर में बिखरे
मेरे सामानों के साथ
खेलते थे
आंख-मिचैली,
धूप-छांव,
पढ़ते थे मेरी किताबों को
और शास्त्रार्थ करते थे
तब
जब मैं घर में नहीं होता था।

पर एक दिन
उजाले ने 
उस कोने से
अनायास ही
अपना मुंह निकाला
और मैं चैंक पड़ा था
फिर..
दोनों सहमे से खड़े थे/मेरे सामने
और मैं……
हतप्रभ/अवाक्
क्या करूं उनका
और कैसे यकीन करूं
उजाले-अंधियारे का
मेरे पुराने से घर के
एक कोने में रहना
जिसमें 
या तो मैं रहता था
या मेरा पुराना सामान
दोनों बिखरे-बिखरे से।

मैं निःशब्द
अपनी चारपाई पर जा लेटा था
और वे दोनों
दरक गए थे
फिर अपने-अपने कोनों में।

सदियों से ढोते अपने एकान्त से
छुटकारा पाने को शायद
एक दिन
मैंने स्वीकार लिया इनका साथ
इसके बाद
हम तीनों साथ साथ हंसते-रोते
और अपनी बातें 
एक-दूसरे को बताया करते थे।

मेरी डायरी में लिखी गई
मेरी निजी बातों को
उजाला कभी पढ़ लेता
तो अंधियारा उसे छिपा लेता।
हर शब्द के
अंधियारे और उजले पहलू का
कभी वह करने लगते अन्वेषण
और मैं हैरान हो सुना करता था।

यह सपना सा तो था
कहानी सी तो थी
परन्तु हकीकत थी
जो मेरे घर के एक कोने में
घटित हो रही थी।
मैं खुश भी था
कि मैं अकेला तो नहीं।

एक दिन अंधियारे के चेहरे पर
घनी दाढ़ी निकल आई
उसका काला चेहरा
गंभीर दिखने लगा
और एकाएक लगने लगा वह
मेरे एक दोस्त की तरह
जो समाज का पहरूआ था।

पर अंधियारा पहरूआ नहीं था
वह बुद्धिजीवी भी नहीं था
उसके चेहरे पर उगी दाढ़ी
उसके गांभीर्य का परिचायक भी नहीं थी
अब वह हमसे कुछ कटने लगा था
वह उदास सा रहता था
और तकता रहता था आसमां को।
मैंने देख ली थी
उसकी आंखों की गहराईयों में
महत्वाकांछाओं की चमक।
मैं जानता था
कि उसने ऊंचाईयां देख ली हैं
और अब…
उसे मेरे घर का कोना
छोटा लगने लगा है
और उजाले का तथा मेरा साथ
बचकाना…।

मैं समझ चुका था
उसे रोकना अब संभव नहीं…
मैंने उजाले को समझाया
उसने भी नियति को स्वीकार
अपनी सहमति दे दी।
और अंधियारा 
हमसे विदा लेकर
आकाश में चला गया
दूर, बहुत दूर
जहां हमारी आवाज नहीं जानी थी
और न ही उसे दिखनी थी
उजाले के हिलते हाथ की उंगलियां।

आसमां को पाते ही
अंधियारे के शरीर का दायरा फैल गया
और पूरे आसमां पर 
अब वही दिखने लगा था
आसमां पर अब 
अंधेरे का साम्राज्य था।

सभी डरते थे अंधेरे से
हालांकि अंधियारा 
किसी को डराता नहीं था
किसी को परेशां करने का
उसका कोई इरादा नहीं था
पर अंधियारे के साम्राज्य में
कुछ मानवों के पैर निकल आये थे
और उनके चेहरे पर
दाढ़ी की तरह स्वार्थ उग आया था
वे मानव
अंधियारे के साम्राज्य के दूत बन गए
और डराने लगे सभी को।
उन्होंने अंधियारे को उलझा लिया था
अपनी चिकनी बातों में।
और अंधियारा 
अब उनसे मशविरा करने लगा था।

एक दिन वह दूत मेरे पास आए
अंधियारे के बढ़ते साम्राज्य के नाम पर
उन्होंने 
मुझसे मेरा घर छिन लिया
और उजाले से उसका कोना।
हमने आवाज लगाई
फरियाद किया
परन्तु उन्होंने अंधियारों के चारों तरफ
एक किला बना दिया था
जिसकी दीवारों पर दूत बैठे थे
और वे रोक लेते थे आवाजों को।

उजाले को स्वीकार नहीं था यह सब
अंधियारे को सच्चाई बताने
एक दिन वह भी चला गया
और अंधियारे के चारों तरफ बने
किले की दीवार पर चढ़ गया
पर इन दूतों को
अंधेरे और अंधियारे के बीच
किसी का हस्तक्षेप पसन्द न था

उन दूतों ने
उजाले के टुकड़े-टुकड़े कर दिए
और उसे आसमां पर बिखेर दिया।
मैंने देखा
एकात् बहुत तारे आसमां पर चमकने लगे
और एक बड़ा सा चांद।
उजाला बंट गया था इनमें
और अंधेरे को हरा रहा था
उसके उजाले से अब
मेरा घर भी दिखने लगा था
और मेरे घर का कोना भी।

एक दिन अंधियारे ने भी
उजाले के टुकड़ों को देख लिया
उसे सच्चाई का अहसास होने लगा
उसे अपनी ही दीवारें कैद लगने लगीं
अब वह भी किले से निकल
खुले आसमां में निकल आया।

अब उजाले और अंधियारे
एक बार फिर मिल गए थे
कितना सुन्दर दृश्य था यह
कितना सुन्दर।
मैं धरती पर बैठ
इसे निहारा करता हूं जब-तब
अंधियारा और उजाला 
दोनों अब बतियाते हैं मुझसे
और मैं उन्हें 
अपनी डायरी में लिखी
भविष्य के आषाओं की
सच्ची/झूठी कहानियां सुनाता हूं।

किले में रहने वाले दूत
अब पृथ्वी पर रहने लगे हैं
उन्होंने मेरा घर
और उसका कोना 
अभी तक मुझे नहीं दिया है
वहां सत्ता की कुर्सियां रख दी गई हैं
और सुनता हूं
वहां से आदेश निकलते हैं
और लोगों के घरों के कोने 
साम्राज्य/धर्म/समाज/कानून के नाम पर
छिन लिए जाते हैं।

मुठ्ठियों का फर्क
———–
बंद मुठ्ठियो का
रोटी से रिश्ता
इतना ही/कि
जब वे मेहनत से
जमीन पर लकीरें बनाती हैं
आसमां पर चमकने लगते हैं
रोटियों के चंद टुकड़े।

कुछ और मुठ्ठियां
जो बनाते हैं फासले
जमीं और आसमां के बीच
रोटियों को जमीं तक
आने नहीं देते।

पहले वाली मुठ्ठियां
रोटियों को पाने के लिए
खुले याचक हाथों में बदल
प्रतीक्षा करती रहती हैं
फिर कूकते पेटों को
सहलाने के लिए
कांपती उंगलियां बन जाती हैं।

खुद के लिए
———-
चाहता हूं
जमीन दे सकूं
अपने सपनों को
आसमां तो सभी देते हैं।

दुआएं दूं
खुद को
खुश रहूं, मुस्कराऊं
दूसरों को अपने साथ लेकर।

नदियों से कहूं
मेरे आंगन में बहो
और हर प्यासे मन का घर
मेरे आंगन में हो।

खुदा को
मंदिर/मस्जिद से उठाकर
उसकी खुदाई छिन लूं
सभी में बराबर बांट दूं।

सबके मन में
अपने लिए प्यार बांटूं
वह प्यार जो सबके लिए
मेरे मन में है।

और तुम ही बताओ
क्या मांगू खुद के लिए
जिसमें तुम्हारा हिस्सा 
मेरे हिस्से से अधिक हो।

उपदेशक
——
वह, 
जो त्याग-त्याग रटते हैं
बैठते हैं लाखों रूपये से सजी
मखमली सेज पर
और टीवी चैनलों से
हफ्ता वसूलते हैं।

उनके सामने 
भेड़ों की भीड़ बैठी होती हैं
जो उनके त्याग के संदेश को
आत्मसात करती है
और अंधी बन
लुट जाती है धन्य होकर।

वह भेड़े नहीं जानतीं
कुछ भेड़ियों ने भी
गेरूए पहन लिए हैं।


मुखौटे
—-
वह
जो मुखौटे बेचते हैं
पहनते नहीं कभी।

वह 
जो मुखौटे पहनते हैं
बेचते नहीं कभी।

ताजिन्दगी
वह बदलते रहते हैं
अपने मुखौटे। 


जो बिकता है
———
जरूरी नहीं
जो बिक रहा हो
वह कोई सामान ही हो।
वह एक पिता भी हो सकता है
जो दफ्तर में
घिसता रहता है अपनी उम्र
और/रोज बालों में सफेदी बढ़ाकर
अधूरा घर लौटता है।

वह एक मां भी हो सकती है
जो आधी उम्र बिता देती है रसोई में
ममता को आटे में मिला
प्रसाद सी रोटियां बनाते हुए
अपने अधूरे होते जाने को
पूर्ण होना मानती हुई।

वह तुम्हारे भीतर पलता 
प्रेम भी हो सकता है,
तुम्हारा परिवार
जिसे रोज शाम को 
तुम्हारी थकी आंखों में मचलते देखता है
पर जो मरता है थोड़ा-थोड़ा
अनेकानेक कारणों से
एक उदास दिनचर्या के साथ।

और भी बहुत कुछ है
जो सामान तो नहीं होता
पर बिकता है रोज
थोड़ा-थोड़ा।

ज़िन्दगी ज़िंदाबाद


6 Comments

  1. [email protected]

    June 14, 2020 at 11:58 am

    बहुत ख़ूब सुरेश बरनवाल और संजीव शाद साहब

    Reply

  2. [email protected]

    June 14, 2020 at 11:58 am

    बहुत ख़ूब सुरेश बरनवाल और संजीव शाद साहब

    Reply

  3. Unknown

    June 15, 2020 at 2:07 am

    वाह भाई सुरेश. .. आपकी कविताएँ बहुत ही संवेदनशील व मानवीयता से ओतप्रोत हैं

    Reply

  4. Unknown

    June 15, 2020 at 2:07 am

    वाह भाई सुरेश. .. आपकी कविताएँ बहुत ही संवेदनशील व मानवीयता से ओतप्रोत हैं

    Reply

  5. suresh baranwal

    June 16, 2020 at 6:00 pm

    शुक्रिया दोस्त

    Reply

  6. suresh baranwal

    June 16, 2020 at 6:00 pm

    शुक्रिया दोस्त

    Reply

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