एक बड़े योद्धा के घर ऐसा हुआ। एक रात उसे अचानक एक चूहे से पाला पड़ गया। वह बड़ा योद्धा था, खड्गधारी था। और चूहा ठीक उसके सामने बैठकर उसे घूर रहा था। इससे योद्धा को बहुत क्रोध आया। कभी किसी ने उसके साथ ऐसा करने की हिमाकत नहीं की थी। तो उसने अपनी तलवार म्यान से निकाल ली, लेकिन चूहा अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। फिर तो योद्धा ने उठाकर तलवार चला दी। लेकिन चूहे ने झट से छलांग लगाई और योद्धा की तलवार जमीन पर गिरकर टूट गई।
ओशो वाणी…
योद्धा तो पागल हो उठा। उसने बार—बार चेष्टा की। लेकिन जितनी चेष्टा की उतनी ही हार हाथ लगी। हार पर हार। चूहे से लड़ना कठिन है। उससे लड़ने को राजी होना ही हार का न्योता देना है। वही हार है। चूहा बलवान हो गया, योद्धा की हर हार ने उसे बलवान बना दिया। वह उछलकर उसकी खाट पर चढ़ गया। योद्धा तो घर से बाहर चला गया। उसने मित्रों से पूछा कि क्या किया जाए? उसने कहा कि ऐसा तो मेरी जिंदगी में कभी भी नहीं हुआ। किसी की भी ऐसी जुर्रत नहीं हो सकती है। और वह भी एक मामूली चूहा! लेकिन यह तो चमत्कार मालूम होता है, मैं तो बुरी तरह हार गया।
तो मित्रों ने कहा कि चूहे से लड़ना व्यर्थ है, उसके लिए किसी बिल्ली को लाना बेहतर होगा। लेकिन चारों ओर यह अफवाह फैल’ गई कि योद्धा हार गया। और बिल्लियों तक यह खबर पहुंच गई। कोई बिल्ली आने को राजी न हुई। सब बिल्लियां इकट्ठी हुईं और उन्होंने अपने नेता से कहा कि तुम जाओ, क्योंकि यह कोई साधारण चूहा नहीं है। उससे योद्धा हार गया है। और हम तो मामूली बिल्लिया हैं। जब उससे यह महायोद्धा हार गया, तो हम किस खेत की मूली हैं? तो तय हुआ कि नेता भीतर जाएगा और शेष बिल्लियां बाहर इंतजार करेंगी।
नेता भी डर गया। नेता सदा डरपोक होते हैं। वे नेता हैं, क्योंकि कायरों की भीड़ है और कायर ही उन्हें चुनते हैं। वे कायरों के नेता हैं। कायर नहीं होते तो नेता भी नहीं होते। बुनियादी बात यह है कि वे कायरों द्वारा चुने जाते हैं; वे कायरों के नेता हैं। लेकिन नेता को जाना पड़ा, क्योंकि अनुयायी उसे धक्के दे रहे थे। वह नेता चुना जा चुका था और अब कुछ नहीं किया जा सकता था।
तो वह नेता बिल्ली डरते—डरते, कापते—कांपते भीतर गई। चूहा बिस्तर पर बैठा था। बिल्ली ने ऐसा चूहा कभी नहीं देखा था; वह बिस्तर पर मजे से बैठा था। बिल्ली सोचने लगी कि क्या किया जाए, क्या उपाय लगाया जाए। वह इस हालत में अपनी पुरानी याददाश्त और अनुभवों को टटोल ही रही थी कि चूहे ने अचानक आक्रमण कर दिया। बिल्ली भाग खड़ी हुई, क्योंकि अतीत में कभी ऐसा नहीं हुआ था। इतिहास में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि किसी चूहे ने बिल्ली पर हमला किया हो! बिल्ली बाहर आकर जमीन पर गिर पड़ी ओर मर गई।
तो पास—पड़ोस के लोगों ने योद्धा को सलाह दी कि अब मामूली बिल्लियों से काम नहीं चलेगा; तुम राजमहल जाओ और राजा की बिल्ली मांग लाओ। राजा की बिल्ली ही कुछ कर सकती है। यह कोई मामूली मामला नहीं है। योद्धा को राजा के पास जाना पड़ा। उसने बिल्ली के लिए निवेदन किया और राजमहल से बिल्ली आयी। लेकिन योद्धा को भरोसा नहीं आया, क्योंकि बिल्ली बहुत मामूली नजर आयी—महज सामान्य। उसे डर था कि कहीं इस बार भी न असफलता हाथ आए। इससे तो वह बिल्ली कहीं बड़ी और बलशाली थी जो नेता चुनी गई थी और चूहे से हारकर मर गई थी। यह अदना बिल्ली! राजा ने कहीं मजाक तो नहीं किया। लेकिन राजा से वह कुछ कह भी नहीं सकता था।
तो योद्धा उस मामूली बिल्ली को लेकर घर आया। बिल्ली अंदर गई, चूहे को मार डाला और बाहर आ गई। सभी बिल्लियां इंतजार कर रही थीं। वे राजमहल की बिल्ली को घेरकर खड़ी हो गईं और उन्होंने उससे पूछा कि तुम्हारा राज क्या है? उस चूहे के हाथों हमारा नेता मारा गया, योद्धा को मुंह की खानी पड़ी और तुमने उसे कैसे इतनी सरलता से मार गिराया और उसके मृत शरीर को लिए बाहर आ गई?
बिल्ली ने कहा : मैं बिल्ली हूं और वह चूहा है। कोई और विधि नहीं है। मैं बिल्ली हूं यह काफी है। किसी विधि की क्या जरूरत? बिल्ली होना काफी है। जब मैंने घर में प्रवेश किया, तो यह काफी था कि एक बिल्ली ने प्रवेश किया। मैं बिल्ली हूं।
यह एक झेन कथा है। अगर तुम्हारा मन मालिक है तो प्रयत्न की क्या जरूरत? सब प्रयत्न आत्मवचना है कि तुम बिल्ली नहीं हो और तुम चूहे से लड़ रहे हो। मालिक बनो! लेकिन मालिक कैसे बना जाए?
तंत्र कहता है कि समझ तुम्हें मालिक बना देगी, और कुछ मालिक नहीं बना सकता। सब मालकियत की कुंजी समझ है, बोध है। अगर तुम इसे ठीक से जानते हो, तो तुम मालिक हो। और अगर नहीं जानते, तो तुम लड़ते रहोगे और तब तुम गुलाम ही रहोगे। और जितने लड़ोगे उतने ही हारते रहोगे। तुम चूहे से लड़ रहे हो।
~ओशो


