कृष्ण कुमार कायत – 98961-05643
शिक्षा :- एम. ए.(इतिहास,राजनीति विज्ञान), प्रभाकर, ज्ञानी, डी. एड., बी.एड.
व्यवसाय :- अध्यापक (एस.एस.मास्टर) राजकीय कन्या उच्च विद्यालय अबूबशहर , सिरसा
सम्प्रति :-
साँझा काव्य संग्रह ( सतरंगे जज्बात )
साँझा हाइकु संग्रह ( यादों के पाखी )
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में काव्य व लघुकथाएं प्रकाशित …..
सह-संपादन :-
सतरंगे जज्बात
हरियाणा शिक्षा विभाग में डी.पी.ई.पी. के तहत पाठ्य पुस्तक निर्माण व वर्तमान में हरियाणा के स्कूलों में लागू इंग्लिश वर्कबुक विकास में सक्रिय भागीदारी ……
सामाजिक जिम्मेदारियां :-
प्रधान :-
हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ, डबवाली
सचिव :-
सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा , डबवाली
प्रधान :-
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर जन-जागृति मंच,
संयोजक :-
हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, लघु कविता मंच
मंडी डबवाली
संचालक :-
अभिवंचित वर्ग के विद्यार्थियों के लिए निशुल्क
लाइब्रेरी एवं कोचिंग सेंटर,डॉ. बी. आर. अम्बेडकर लाइब्रेरी एंड कोचिंग सेंटर,
किताब प्रोत्साहन प्रकल्प :-
लाइब्रेरी आपके द्वार ( मोबाइल लाइब्रेरी ) डोर टू डोर अभियान
:-चंद कविताएँ :-
*अच्छे दिन*
निकल पड़े हैं
अलसुबह
ये हाथ
कूड़ा बीनने ।
वक्त के
बेरहम हाथों से
दो वक्त की
रोटी छीनने ।
सारा कूड़ा बीनकर
मेहनत तेरी
इस शहर की
शोभा बढ़ाती है ।
पर, सच
ये भी है कि
तेरी गंदी
झुग्गी – झोंपड़ी
इस सुंदर शहर का
मुंह चिढ़ाती है ।
सभ्य जनों का
बिखराया कचरा
उठा कर
तुम ले जाते हो ।
करते हो साफ़-सफाई
फिर भी
कचरे वाले कहलाते हो ।
शाइनिंग इंडिया में भी
चमक न आई तुझ पर
न फील-गुड़ में
गुड़ फील किया
हाथ के बहकावे में
बहकते रहे हर बार
अब फिर से कौन
तुम्हें बहका गये हैं ?
नियति ना बदली तेरी
कचरे से रोटी बीनने की
जबकि सभी के
अच्छे दिन आ गये हैं ……|
*********************************
“ मजदूर ”
सर्द हवाओं का नहीं रहता
खौफ मुझे
और ना ही मुझे कोई
गर्म लू सताती है
आंधी, वर्षा और धूप का
मुझे डर नहीं
मुझे तो बस ये पेट की
आग डराती है
उठाते होओगे तुम
आनंद जिन्दगी के
यहां तो जवानी
अपना खून सूखाती है
खून पसीना बहा कर भी
फ़िक्र रोटी की
टिड्डियों की फौज
यहां मौज उड़ाती है
पसीना सूखने से पहले
हक़ की बात ?
हक़ मांगने पर मेहनत
खून बहाती है
रखे होंगे इंसानों ने
नाम अच्छे – अच्छे
मुझे तो “कायत”
दुनिया मजदूर बुलाती है
**************************
*ज़माना*
ये ज़माने को क्या हो गया है ………… -२
कोई पूर्व में है जाग रहा ,
कोई पश्चिम को है भाग रहा
आराम की भी नहीं फुर्सत
चलते – फिरते आँखें मूंदें
तलाशते सब इधर उधर
जाने किन तृष्णाओं को ढूंढें
मिल गया है खास या फिर
सभी का कुछ खो गया है
ये ज़माने को क्या हो गया है……………………. -२
मलमल के कोमल गद्दों पर
वो सोने की चेष्टा है कर रहा
नींद नहीं उसकी आँखों में
किसी अनजानी सोच से है डर रहा
उधर एक लाचार – फटेहाल
सड़कों पर है घूम रहा
लिए मन में जीने की आस
आराम को है जगह दूंढ़ रहा
लो, वो देखो थक हार कर
फूटपाथ पर ही सो गया है
ये ज़माने को क्या हो गया …………………….. -२
घुट घुट कर हैं सब जी रहे
बगावती होंठों को है सी रहे
आंसुओं का सैलाब
दिलों में रोक रखा है
बूँद भी न गिरने पाए
काँटों से जोख रखा है
छोड़ा किसने सब्र का दामन
भीगा है जो जहाँ का आँगन
देख हालत संसार की
आज आसमां भी रो गया है
ये ज़माने को क्या हो गया है……………….. -२
उगाई है जो फसल
वो ही तो काटेंगे
दुःख का भरा है हर कोई
सुख कौन कहाँ से बांटेंगे
न वो पहले सी बहार
न फूलों की मादकता है
रिश्वतखोरी , भ्रष्टाचार
अत्याचार व अराजकता है
फसलें जैसी पनप रही हैं
कौन विष बीज बो गया है
ये ज़माने को क्या हो गया है ………….
*** ** ****************************
“युद्ध का चाव ”
चाव होगा तुम्हें युद्धों का
मैं तो हर रोज ही
युद्ध करता हूं …..
भूख, गरीबी, लाचारी से ।
बढ़ती कीमतें, घटती आमदनी
कभी हुक्मरानों की मक्कारी से ।।
मैं ही करता हूं
तुम्हारे कारखानों में मजदूरी ,
खेतों में अन्न, फल बागानों में
मैं ही उपजाता हूं ।
रोजी की खातिर
सुरक्षा को तुम्हारी
सीमा पर भी
मैं ही मर जाता हूं ।।
ठगते हो मुझे ही तुम
धर्म का खौफ दिखाकर ।
बहका जाते हो कभी
मुझे मेरी कौम बताकर ।।
फंस कर चालों में तुम्हारी
दंगे भी मैं ही करता हूं
चाव होगा तुम्हें……….
मक्कारी का खेल खेलकर
मत बहकाओ
मुझ जैसे नादानों को ।।
युद्ध का इतना चाव है तो
सीमा पर भेजो
तुम अपनी संतानों को ।।
झांसों में आकर
हर बार तुम्हारे
“कायत” मैं ही
राजा चुनता हूं
चाव होगा तुम्हें युद्धों का
मैं तो हर रोज ही
युद्ध करता हूं………।।
**********************
ठहराव
गुजर जो कहर गया है
ये जीवन भी ठहर गया है ………….
देख सिसकती ये हालत
खो चुकी जीने की चाहत
भुलाने की कोशिश में
और गहरी होती याद
हमसाया ही बन गया
देखो, कैसा कठोर निषाद
मृत हो गया है मन
जैसे पी ज़हर गया है
गुजर जो कहर गया है
ये जीवन भी ठहर गया है ……….
बिछड़ा साथी, उजड़ा कारवां
चिलचिलाती धूप में भी
अंधियारे का आभास है
मंजिल ओझिल, राहें गुम
गम भरी साँसों की भी
अब नहीं कोई आस है
खोया – खोया सा जहाँ
कैसी निस्तब्धता छाई है
लूट ले गया सारी रौनकें
बीत ये जो पहर गया है
गुजर जो कहर गया है
ये जीवन भी ठहर गया है ……….
**************************************
लघु कथा
अपना बच्चा
आधी छुट्टी के समय खाना खाते हुए सरोज के ध्यान में आया कि उनकी साथी अध्यापिका रेणु मौजूद नहीं है, तो उसने बाकी स्टाफ से कारण जानना चाहा । किसी को उसके बारे में पता नहीं था कि वह खाना खाने के लिए स्टाफ रूम में क्यों नहीं आई । अंजू मैडम ने चिन्ता जताई कि कहीं उनकी तबीयत तो खराब नहीं है क्योंकि उनकी कक्षा के सभी विद्यार्थी भी आज बाहर मैदान में खेलते घूम रहे थे । मुख्याध्यापिका ने कहा , “ अरे उनके पास तो पांचवीं कक्षा है और उनकी वार्षिक परीक्षा भी कल से शुरू है और पिछले दो दिन से भी रेणु छुट्टी पर थी ।”
तभी खाना बनाने वाली वर्कर वहां आई तो उसने बताया कि रेणु मैडम जी तो कक्षा में ही बैठी हैं और सुबह से अपने साथ लाये बेटे को पेपर की तैयारी करवा रही हैं । सरोज ने आश्चर्य व्यक्त किया , “पहली कक्षा के बच्चे की पढ़ाई पर इतना जोर ? ”
“हांजी मैडम जी, वो अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता है न ! वर्कर ने समझाने वाली मुद्रा में जवाब दिया |
*****************************
“ किताब ”
“ जिन बच्चों ने होम वर्क पूरा नहीं किया है वो खड़े हो जाएँ ” अध्यापक ने कक्षा में आते ही आदेश सुनाया | एक – एक कर कई विद्यार्थी खड़े हो गये | रीना को डांट लगाते हुए अध्यापक ने पूछा कि इतने दिन की छुट्टियाँ थी फिर भी होमवर्क पूरा क्यों नहीं किया ?
रीना गर्दन झुकाए खडी रही | अध्यापक ने फिर डांट लगाई , “ जवाब दो , सुनता नहीं है क्या तुम्हे ?” रीना के आंसू निकल पड़े और बोली, “ जी, मेरे पास किताब नहीं है ” अब तो अध्यापक का गुस्सा सातवें आसमान पर था | “ अभी तक किताब भी नहीं खरीदी तुमने ?, तुम लोगो को तो पैसे भी मिलते हैं सरकार से , तुम्हें पैसे नहीं मिले क्या इस बार ? ”
“ जी, मिले थे पैसे तो …..” रीना ने धीमी आवाज में उत्तर दिया | “ तो… ? तो क्या किया उन पैसों का ?” अध्यापक ने और ऊँची आवाज में चीखा | “ जी, गाय के लिए तूड़ी ( चारा ) खरीद ली…. ” रीना ने एकदम से रोते हुए कहा और जोर – जोर से सुबकने लगी |
तभी पास बैठी छात्रा सुनीता ने स्पष्ट करते हुए बताया कि रीना के पिता जी बीमार रहते हैं इसलिए पूरे परिवार का गुजारा घर में पाली हुई एक गाय का दूध बेच कर होता है | इस समय गेहूँ के सीजन में तूड़ी ठीक दाम पर मिल जाती है इसलिए लोग इकठ्ठी तूड़ी खरीद लेते हैं ताकि पूरे वर्ष काम चल जाए |
अब अध्यापक विचार मग्न था कि तूड़ी ज्यादा जरूरी है या किताब …………… ?
कृष्ण कायत



SUKHJINDER
June 6, 2020 at 1:52 am
Excellent Sir Ji ����
SUKHJINDER
June 6, 2020 at 1:52 am
Excellent Sir Ji ����
Meenakshi Ahuja
June 6, 2020 at 5:12 am
कृष्ण कायत जी की रचनाएं यर्थाथ के पथरीले पथ के उस दर्द को अभिव्यक्ति देती हैं जिसमें एक गरीब पिसता है या समाज की विद्रूपताओं का चेहरा प्रस्तुत करती प्रतीत होती हैं। बधाई कायत जी।
Meenakshi Ahuja
June 6, 2020 at 5:12 am
कृष्ण कायत जी की रचनाएं यर्थाथ के पथरीले पथ के उस दर्द को अभिव्यक्ति देती हैं जिसमें एक गरीब पिसता है या समाज की विद्रूपताओं का चेहरा प्रस्तुत करती प्रतीत होती हैं। बधाई कायत जी।