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काव्य कुंज

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ग़ज़ल :-राजकुमार निजात 

  उसका मन गुलशन-गुलशन है उसका चेहरा फूलों सा ।
  उसकी आँखों में जीवन है उसका चेहरा फूलों सा ।। 
  उसके भीतर कई बहारें उसके भीतर सूरज है । 
  उसके चेहरे पर बचपन है उसका चेहरा फूलों सा ।। 
  वह रातों में जुगनू बनकर टिम-.टिम करता रहता है । 
  तारों सा उसका दामन है उसका चेहरा फूलों सा ।। 
  अपनी आँखों से वह अपना रूप बदलता रहता है । 
  उसका चेहरे पर चिलमन है उसका चेहरा फूलों सा ।। 
  उसके भीतर कितने मौसम सावन बनकर आते हैं ।
  खिला हुआ सा उसका मन है उसका चेहरा फूलों सा ।। 
  महक भरा इक मौसम उसके हरदम साथ विचरता है ।
  चंदन सी उसकी चितवन है उसका चेहरा फूलों सा ।।
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अनजाने बेनाम पतों पर ,
दिल के ख़त लिखवाना छोड़।
मंदिर, मस्जिद , गिरजे से बच,
इंनसां से कतराना छोड़ ।
लोगों को मिलती है तस्कीं ,
दिल का हाल सुनाना छोड़ ।
सच कहना और गले लगाना,
ये आदत बचकाना छोड़ ।
भरम टूट जाऐंगे सारे,
गहरी तह तक जाना छोड़ ।
हुआ वुसूल नहीं तो क्या है,
दिल था इक नज़राना छोड़ ।
हारी है ग़र दिल की बाज़ी ,
जश्न मना पछताना छोड़ ।
क्या ‘ कमाल ‘ की बातें करना,
वो तो है दीवाना छोड़ ।
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२. 
बारिश में मैं भी खुश था मगर डर लगा मुझे ,
गिर जाए ना  कच्चा सा मेरा घर लगा मुझे ।
दामन में उसके हुस्न था, ख़ुशबू  थी, प्यार था,
जो इक नज़र में मैली सी चादर
लगा मुझे ।
उसके बिना भी दिल मेरा उजड़ा
दयार था,
उस बेवफ़ा को दिल से लगा कर लगा मुझे ।
वो भी तो मेरे होंठों की मानिंद 
ख़ुश्क था,
वो दूर से जो एक समन्दर लगा 
मुझे ।
तू आसपास है मेरे इसका मिला
सुराग़ ,
पत्थर कहीं से एक जो आकर
लगा मुझे ।
दामन का तेरे तार कि गेसू का
पेच-ओ-ख़म ,
हर क़ाफ़िया रदीफ़ से बेहतर 
लगा मुझे ।
प्रो. आर. पी. सेठी ‘ कमाल ‘
पूर्व सदस्य ,
सलाहकार समिति
खाद्य मंत्रालय , भारत सरकार
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इस दौर पे कुछ खास,खास दोस्तों के लिये
चार दिन हैं जिन्दगी का फिक्र करो,
बेहतर होगा उसी का जिक्र करो।।।
है नही कोई यहां हमदर्द तेरा,
खुद सुनो खुद की हिफाजत कद्र करो।
बेवजह के दर्द क्यो हैं पाल रखे,
है हसीं जीवन मजे से बसर करो।
मेहनतकश को सदा हासिल है मंजिल,
मेहनत से हो भला मत कसर करो।।
तब बिना मांगे मिले मनचाह तुझे,
मांगने से पहले कुछ तो नजर करो।।
रोग कोरोना बुरा है इस से बचो,
बेहतर हो फासले से सफर करो ।।
जान ले रैना”रहे तब दूर गिले,
तुम इधर की मत कभी उधर करो।।रैना””
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*ਅਾਖਰੀ ਸੀ ਸਾਲ ਬੜਾ ਕੁਝ ਸੀ ਦਿਮਾਗ ‘ਚ,
ਨੀਂਦ ਹੀ ਸੀ ਚੰਗੀ ਬੇਚੈਨੀ ਹੈ ੲੇਸ ਜਾਗ ‘ਚ, 
ਬਿਪਤਾ ਪੲੀ ਚਾਰੇ ਪਾਸੇ ਹੀ,
ਰਹਿ ਹੋਣਾ ਨੀ ਬੇਪਰਵਾਹ ਬਣ ਕੇ, 
ਕੀ ਕਰੀੲੇ ਖਾਬ ਭਵਿੱਖ ਦੇ ੳੁੱਡ ਗੲੇ ਵਾਅ ਬਣਕੇ |
* ੳੁਹ ਪਾਣੀ ਵਾਲੀ ਦਾਲ ਤੇ ਅੱਧ ਪੱਕੀ ਰੋਟੀ,
ੲੇਸ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਨਾਲੋਂ ਸੀ ਸਮੱਸਿਅਾ ਛੋਟੀ,
ਜਦ ਵੀ ੳੁਦਾਸ ਹੋ ਬੈਠਿਅਾਂ ਕਦੇ, 
ਯਾਰਾਂ ਦੇ ਮਜ਼ਾਕ ਸੀ ਮੁੱਖ ਅਾੳੁਦੇ ਹਾਸਾ ਬਣ ਕੇ,
ਕੀ ਕਰੀੲੇ ਖਾਬ ਭਵਿੱਖ ਦੇ ੳੁੱਡ ਗੲੇ ਵਾਅ ਬਣਕੇ |
*ਕਿਸੇ ਨੇ ੲੇਥੇ ਸੋਚਿਅਾਂ ਕਿਸੇ ਦੇ ਪਲੈਨ ਬਾਹਰਲੇ,
ਲਗਭਗ ਸਾਰਿਅਾਂ ਸੁਨਹਿਰੇ ਕੱਲ੍ਹ ਸੀ ਵਿਚਾਰਲੇ,
ਰੱਬ ਜਾਣੇ ਕਦੋਂ ਮਿਲੂ ਡਿਗਰੀ,
ਬੋਹੜੂ ਖੁਦਾ ਕਿਤੋਂ ਦਵਾ ਬਣ ਕੇ,
ਕੀ ਕਰੀੲੇ ਖਾਬ ਭਵਿੱਖ ਦੇ ੳੁੱਡ ਗੲੇ ਵਾਅ ਬਣਕੇ |
*ਚੁੱਪ ਹੋਗੇ ਸਾਰੇ ਨਾ ਮੈਸੇਜ ਨਾ ਕਾਲ,
ਕੲੀ ਫਿਕਰਾਂ ਗੁਰ ਦਾ ਕੀਤਾ ਮੰਦਾ ਹਾਲ, 
ਮਹੀਨਾ ਹੋੲਿਅਾ ਬੋਲਿਅਾਂ ਨੀ ਯਾਰ ਜੋ ਕਰੀਬੀ,
ਧਾਹ ਨਿਕਲ ਦੀ ਮੇਰੀ ਕਵਿਤਾ ਬਣ ਕੇ,
ਕੀ ਕਰੀੲੇ ਖਾਬ ਭਵਿੱਖ ਦੇ ੳੁੱਡ ਗੲੇ ਵਾਅ ਬਣਕੇ ||
?ਗੁਰਜੀਤ ਕੁਮਾਰ (ਗੁਰ ਕੋਟ) (ਬੀ.ਅੈੱਸ. ਸੀ. ਅੈਗਰੀਕਲਚਰ ) ,ਪੀ.ੲੇ. ਯੂ. ਲੁਧਿਅਾਣਾ

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