आज हरिभजन सिंह रेणु की 13वीं पुण्यतिथि पर विशेष
संवेदनशील संजीदा रचनाधर्मी, प्रगतिशील चिंतक, सामाजिक सरोकारों से लबरेज़ व्यक्तित्व, उत्तम जीवन पद्धति एवं उदात्त काव्य-भाषा के अति ख़ूबसूरत संगम हरिभजन सिंह रेणु के विराट व्यक्तित्व, प्रौढ़ चिंतन एवं महान सृजन को साहित्यिक सलाम।
– डॉ. हरविंदर सिंह सिरसा
अध्यक्ष, पंजाबी विभाग, राजकीय नैशनल महाविद्यालय, सिरसा
‘भुक्ख’, ‘अगन पंखेरू’, ‘मस्तक अंदर सूरज’, ‘एंटीने ‘ते बैठी सोनचिड़ी’, ‘सुकरात नूं मिलन जाणैं’, ‘भूमिका तों बग़ैर’ व ‘मेरे हिस्से दे वरके’ काव्य-संग्रहों के सृजक हरिभजन सिंह रेणू (7 मई 1941 – 3 जून 2012) का नाम पंजाबी के नामवर प्रतिबद्ध प्रगतिवादी कवियों में शुमार है। ईमानदारी, सादगी, गंभीरता, संजीदगी, शालीनता, विनम्रता एवं स्पष्टवादिता उनकी जीवन पद्धति का अटूट अंग थे। इन सबके बावजूद वह सहज कम असहज ज़्यादा लगते थे। लेकिन इस असहजता/उत्तेजना में उनके अनियंत्रित होने का भाव विद्यमान नहीं था। इसमें एक विवशता थी, बेचैनी थी, व्यक्ति एवं समाज में व्याप्त विद्रूपताओं के ख़िलाफ़। इस उत्तेजन में हताशा नहीं, सामाजिक विषमताओं के विरुद्ध नाबरी थी। अपने जीवन, चिंतन एवं सृजन में उन्होंने कभी बीच का रास्ता स्वीकार नहीं किया। एक अक्खड़, फक्क्ड़ एवं सचेत रचनाधर्मी का जीवन जीते हुए रेणु ने सिद्धांत एवं व्यवहार से कभी समझौता नहीं किया। अक्खड़ भाषा का प्रयोग उनके प्रभावी व्यक्तित्व का ही नहीं, उनकी काव्य-भाषा का भी उदात्त/सौंदर्य पक्ष बनता गया। इसीलिए कई बार उनके क़रीबी/रक़ीबी उन्हें कबीर साहेब के क़रीब विचरते हुए महसूस करते हैं। रेणु का जीवन उत्तम जीवन पद्धति व उदात्त काव्य-शैली का एक अति-ख़ूबसूरत संगम था।

बाज़ारवाद, मंडी, उपभोक्ता संस्कृति की चकाचौंध में भी अपने आपको तमाम लालसाओं से विमुक्त रखते हुए सरल, सरस, संयमित रखा जा सकता है, इस प्रतिमान की स्थापना करते हुए रेणु ने ऐसी ख़ूबसूरत, शानदार, स्वाभिमान एवं मढ़क/मटक से लबालब ज़िंदगी जी कर ही नहीं दिखाई, अपने परिवार के तमाम सदस्यों में भी ऐसे संस्कार, ऐसी अभिरुचि पैदा कर आमजन के लिए अनुकरणीय उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रेणु ने तमाम उम्र संघर्ष किया और उनका काव्य-सृजन भी आमजन के संघर्ष की गाथा है। ज़िंदगी व काव्य के इस नायक को तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावज़ूद किसी भी स्तर पर हार स्वीकार्य नहीं:
चारों ओर से सुन रहा हूँ
बघयाड़-भेड़ियों की आवाज़
सिर पर काल बनकर उड़ रहे हैं
मौकापरस्त बाज़
इनसे तो / कभी हारे नहीं
इनसे कभी हारना नहीं।
ऐसे संवेदनशील संजीदा रचनाधर्मी, प्रगतिशील चिंतक, सामाजिक सरोकारों से लबरेज़ व्यक्तित्व, उत्तम जीवन पद्धति एवं उदात्त काव्य-भाषा के अति ख़ूबसूरत संगम हरिभजन सिंह रेणु के विराट व्यक्तित्व, प्रौढ़ चिंतन एवं महान सृजन को साहित्यिक सलाम।
– डॉ. हरविंदर सिंह सिरसा
अध्यक्ष, पंजाबी विभाग, राजकीय नैशनल महाविद्यालय, सिरसा

