Home साहित्य दर्पण डायलॉग यानी बातचीत बंद नहीं होनी चाहिए बातचीत से दोबारा एक होने का रास्ता निकलता है

डायलॉग यानी बातचीत बंद नहीं होनी चाहिए बातचीत से दोबारा एक होने का रास्ता निकलता है

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क्योंकि जब हम एक-दूसरे से नहीं बोलते, तब हम एक-दूसरे के बारे में बहुत कुछ बोलने लगते हैं।

जीवन में हम सभी के अपने-अपने स्वभाव हैं। कोई जल्दी खुल जाता है, कोई चुप रहकर अपनी बातों को भीतर ही रखता है। कोई छोटी बातों पर सहज रहता है तो कोई थोड़ी सी बात से भी परेशान हो जाता है। यह सब इंसानी स्वभाव का हिस्सा है। लेकिन जीवन में एक ऐसी स्थिति भी आती है, जब बिना किसी बड़े कारण के मन भारी होने लगता है। चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है, किसी से बात करने का मन नहीं करता और भीतर से एक आवाज आती है — “बस मुझे अकेला छोड़ दो, कोई मुझसे बात न करे।”

कुछ देर का अकेलापन आराम दे सकता है, लेकिन जब यही अकेलापन आदत बन जाए तो यह धीरे-धीरे इंसान को भीतर से कमजोर करने लगता है। वह अपने ही विचारों के जाल में उलझने लगता है। मन की खिड़कियां बंद होने लगती हैं और जब खिड़कियां बंद होती हैं, तो रोशनी भी अंदर नहीं आ पाती।

यहीं पर बातचीत की अहमियत शुरू होती है

बातचीत सिर्फ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं है, यह दिलों के बीच एक पुल है। कई बार हम सोचते हैं कि सामने वाला हमें समझेगा नहीं, हमारी बात को महत्व नहीं देगा या हमारी परेशानी बहुत छोटी है। लेकिन सच यह है कि कई समस्याएं इसलिए बड़ी हो जाती हैं क्योंकि हम उन्हें भीतर कैद करके रखते हैं।

एक दोस्त का हाल पूछ लेना, किसी अपने को फोन कर लेना, परिवार के साथ कुछ समय बैठ जाना या सिर्फ इतना कहना — “आज मन ठीक नहीं है” — कई बार इतना ही काफी होता है।

बातचीत का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि यह टूटे हुए रिश्तों को जोड़ सकती है, दूर हुए लोगों को करीब ला सकती है और बिखरे हुए मन को फिर से संभाल सकती है। जहां संवाद खत्म होता है, वहां गलतफहमियां जन्म लेती हैं और जहां बातचीत शुरू होती है, वहां समाधान अपने कदम बढ़ाने लगता है।

किसी भी बात को लेकर अगर आपसी बातचीत बंद हो भी गई हो, तो एक बात का हमेशा ख्याल रखिए…

क्योंकि जब हम एक-दूसरे से नहीं बोलते, तब हम एक-दूसरे के बारे में बहुत कुछ बोलने लगते हैं।

खामोशी कई बार सच से ज्यादा कहानियां बना देती है। दूरी बढ़ने लगती है, मन अपने हिसाब से अर्थ निकालने लगता है और फिर छोटी-सी गलतफहमी भी बड़ा फासला बन जाती है। इसलिए रिश्तों में संवाद का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं होना चाहिए।

जीवन हमें यह भी सिखाता है कि हर समस्या अपने साथ उसका समाधान भी लेकर आती है। वह समाधान कहीं बाहर नहीं होता, कई बार वह उसी समस्या की जेब में छुपा बैठा होता है। जरूरत सिर्फ उसे ढूंढने की होती है और बातचीत उस जेब तक पहुंचने की सबसे आसान चाबी है।

इसलिए यदि कभी मन कहे — “सबसे दूर हो जाओ” — तो उसी समय किसी अपने के पास चले जाइए। क्योंकि कई बार जिंदगी बदलने के लिए किसी बड़ी सलाह की नहीं, सिर्फ एक सच्ची बातचीत की जरूरत होती है।

बात करते रहिए, जुड़े रहिए — क्योंकि बातचीत खत्म होना, उम्मीद खत्म होने जैसा नहीं होना चाहिए।

– Saanjiv Shaad
The Mission: Positive Waves

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