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अकेला न समझ तू मुझे…….

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अकेला ना समझ तू मुझे
मेरे साथ इक आत्म विशवास चलता है
आम आदमी हूँ इसलिए मेरा आंधियो में भी चिराग जलता है
तेरा आसन तेरी  सल्तनत तो पलभर का तमाशा है
मेरा तो धरती पे मित्रो के साथ हर रोज दरवार लगता है
डर नहीं है
मुझे
मैं
बेखोफ हूँ
सेहरा नहीं हमेशा सर पे
मेरे बस कफन सजता है
रोयेगे नहीं करेगे बाते
मरने के बाद भी लोग
बंजर धरा के गर्भ से भी कभी कभीं
कोई  गुलाब महकता है
“तहजीब है की मै सिर्फ
कविता ही लिखता हूँ
और गीत गुनगुनाता हूँ…….”

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मेरे साथ इक आत्म विशवास चलता है
आम आदमी हूँ इसलिए मेरा आंधियो में भी चिराग जलता है
तेरा आसन तेरी  सल्तनत तो पलभर का तमाशा है
मेरा तो धरती पे मित्रो के साथ हर रोज दरवार लगता है
डर नहीं है
मुझे
मैं
बेखोफ हूँ
सेहरा नहीं हमेशा सर पे
मेरे बस कफन सजता है
रोयेगे नहीं करेगे बाते
मरने के बाद भी लोग
बंजर धरा के गर्भ से भी कभी कभीं
कोई  गुलाब महकता है
“तहजीब है की मै सिर्फ
कविता ही लिखता हूँ
और गीत गुनगुनाता हूँ…….”

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