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एक तिनके का कमाल…..

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(मेरे एकल नाटक तिनका का पहला डायलॉग…)

बस ये ही इक बात खतरनाक ….
हर कोई चाहता है कोई और लडे …..
बंदूक हमारी और कंधा किसी का
तो फिर
लड़ाई…..
अब और किस लिए
किसके लिये
क्योकि
मै और नहीं चाहता लड़ना
और बोलना
बस
मै मुर्दा हो
गया हूँ
और शामिल हूँ भेड़ो की भीड़ में
कल अंतिम विदाई है
तुम भी आना और बस सिर्फ रोना
और कहना की
हम क्या कर सकते है
अब कुछ नहीं होगा
सिर्फ 2मिनट का मौन और पल भर का दिलासा और अफ़सोस पर चुनावी चर्चा या फिर इधर उधर की बकवास या चुगली
मुझे जिन्दा जी मरने के लिए काफी है
क्योकि
हाथ बांध के युद्ध नहीं होते
होती है तो सिर्फ
शांति वार्ता

मै
अब चुप हूँ खामोश हूँ
तुम जो मर्जी सोचो
तूफान के पहले
की चुप
या बाद की
खमोशी।।

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