कैसी लगी ये दिल लगी…... ………………..प्रेमशब्द …………… इक मुकमल अल्फाज है विशवास है संस्कार है और नगद नही उधार है सौदा सस्ता है और कहते है ढ़ाही आखर प्रेम के पढे सो……………. दिल के जज्बात है अधूरे ख्बाव है बिन शब्दों के ख़याल है बंजर जमी पे उग आये फूल उम्मीदों के और सपनो की उड़ान है मौन है वो …
कैसी लगी ये दिल लगी..

