Home साहित्य दर्पण घरफूंक थियेटर फेस्टिवल – नाटक ‘पतझड़ के बाद’ ने दी परिवार से ठुकराए बुजुर्गों की पीड़ा को अभिव्यक्ति

घरफूंक थियेटर फेस्टिवल – नाटक ‘पतझड़ के बाद’ ने दी परिवार से ठुकराए बुजुर्गों की पीड़ा को अभिव्यक्ति

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घरफूंक थियेटर फेस्टिवल – नाटक ‘पतझड़ के बाद’ ने दी परिवार से ठुकराए बुजुर्गों की पीड़ा को अभिव्यक्ति

रोहतक, 7 दिसम्बर। कई बार ज़िंदगी के कड़वे अनुभव या हमारे भीतर का डर इतना हावी हो जाता है कि हम लंबे पतझड़ के बाद आई बहार को भी स्वीकार नहीं कर पाते। यही सच घरफूंक थियेटर फेस्टिवल में हुए इस बार के नाटक पतझड़ के बाद में उभर कर आया। सप्तक रंगमंडल, पठानिया वर्ल्ड कैंपस और सोसर्ग के संयुक्त तत्वावधान में स्थानीय किशनपुरा चौपाल में मंचित इस नाटक में दो ऐसे प्रौढ़ों की कहानी दिखाई गई जो परिस्थितियों के वशीभूत होकर वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। एक-दूसरे का सुख-दुःख बांटते-बांटते दोनों हमउम्र महिला-पुरुष को अपनेपन का ऐहसास होने लगता है। लेकिन लंबे पतझड़ के बाद जब प्यार की कोंपल फूटती हैं, तो महिला इस आशंका से पीछे हट जाती है कि कहीं फिर से उसके जीवन में पतझड़ न आ जाए।

बियॉन्ड इमेजिनेशन, दिल्ली की ओर से सुरेंदर सागर द्वारा लिखे और निर्देशित पतझड़ के बाद में सुरेन्द्र सागर और सुनीता पसरीजा के जीवंत अभिनय ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। सुधा एक रिटायर्ड प्रिंसिपल है। बांझ होने के झूठे आरोपों से त्रस्त होकर ससुराल और मायका दोनों छोड़ने पड़े तथा वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हो गई। इधर, बैंक मैनेजर कमल भटनागर का बेटा और बेटी अमेरिका में रहते हैं। पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर भी बेटा वापिस आने को तैयार नहीं हुआ। जब उसके गम में पत्नी गुज़र गई तो भी वह नहीं आया। अकेले कमल को वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़ा। छोटी-छोटी बातों पर नोकझोंक के बाद कमल और सुधा में दोस्ती हो जाती है। दोनों अपने अकेलेपन से परेशान हैं और एक-दूसरे का साथ चाहते हैं। कमल जब सुधा को प्रपोज़ करता है, तो वह भी खुश हो जाती है। लगता है कि जीवन में बहार आने ही वाली है। इसी बीच कमल उसे अपनी पत्नी के प्यार बारे में बताता है, तो सुधा डर जाती है कि पूर्व पत्नी को इतना प्यार करने वाला अगर उसे पूरा प्यार नहीं दे पाया तो कहीं फिर से उसके जीवन में पतझड़ न आ जाए। इसी आशंका में वह पीछे हट जाती है।

नाटक ने महिलाओं की स्थिति, पुरुषप्रधान मानसिकता, वृद्ध मां-बाप की उपेक्षा व अकेलेपन की पीड़ा को बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। बानगी के तौर पर वर्तमान में बुजुर्ग मां-बाप के प्रति बच्चों की सोच को दिखाता कमल एक संवाद देखिए – “अमेरिका में जब बेटे को मां की मृत्यु की सूचना मिली, तो अपनी बहन से कहता है कि बहन, मां गुजर गई है, तुम चली जाओ। जब पिताजी गुजरेंगे तो मैं चला जाऊंगा।” कुलमिलाकर नाटक दर्शकों को झकझोरने में कामयाब रहा।

नाटक के बाद सप्तक की ओर से डॉ. हरीश वशिष्ठ, विकास रोहिल्ला और अमित शर्मा ने गीत और गज़लों का कार्यक्रम प्रस्तुत किया। इस अवसर पर डॉ. मनोज रावल, एसबीआई बैंक में मैनेजर गुरप्रीत सिंह, मीनू व राजीव चावला, रवि रविन्द्र सिंह, अनिल सैनी, वीरेंद्र फोगाट, मनीषा, अंकुर, सन्नी कौशिक, अभिनव टोली से जगदीप जुगनू, विकास रोहिल्ला, मनोज कुमार, यतिन वधवा, अंजली, रिंकी बतरा और अविनाश सैनी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में अभिनव टोली के बच्चों का विशेष योगदान रहा। मंच संचालन सुजाता ने किया।

विश्वदीपक त्रिखा

tothepointshaad ज़िन्दगी ज़िंदाबाद

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