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मैं इक चाबी का खिलौना..

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ओशो जन्ममोहत्सव पर एक मित्र ने तस्वीर भेजी
तो एक कविता का जन्म हुआ
मैं इक चाबी का
खिलौना
क्या मेरा खोना पाना
मेरा सारा जीवन
बस इक हँसना रोना……
सुंदर छेलछबीला
रंग रंगीला
पथ है मेरा
बस कलाबाज़ीया
का इक रुतबा
तेरा रूठना मेरा मनाना
सुख दुःख का ही ढोना
मैं इक चाबी का खिलौना……..
दो आँखे
इक दिल मुझ में
कच्ची मिट्टी की मूरत
सूरत अजब बनाई
रिश्ते नाते लाद के मुझ पे
कहता है हर कोई
चल मेरे भाई
मैं छम छम ठुमक ठुमक
नाच दिखाऊ
मालिक का जब पानी भरना
तो फिर
मुश्किल देर तक सोना
मैं चाबी का…………
पाँच तत्व का रूप है मेरा
न मांगूँ सोने की अंगूठी
न चाँदी का छल्ला
मैं नाचना तेर इक जोगन बन के
हाथो में ले इकतारा
मेरे लिए तो तू ही तू
तेरा ही इक होना
मैं चाबी का………………..
मैं अवगुण
मन कूड़ा करकट
दमड़ी मोटी
नियत खोटी
अर्श भी तेरा फर्श भी तेरा
तेरे हाथ है चाबी मेरी
तेरा घर है दूर
मिटा दें मुझ में से मेरा मैं का होना
मैं चाँदी का………………….
हार न जीत गम न खार
तू सच
मै झूठ
मन दर्पण में इक अक्स है तेरा
तेरे मेरे बीच में इक छोटा सा पर्दा
रूठा ना कर किरदार बड़ाहै तेरा
मेरा तो इक वक्त तय है
पल दो पल की कथा कहानी
पल पल मेरा खोना
मैं इक चाबी का……………
रहमत तेरी पे
और वक़्त के साज पे
गीत मुहब्बत के गुनगुनाउंगा
सूरज हूं अंधेरों को मिटा जाऊंगा
याद करेगी इक दिन दुनिया
मेरा आना जाना
साई खसम के हाथ
खत्म होगी जिस दिन
सांसो की चाबी मेरी
उस दिन तान चादर मैं सोना
मैं चाबी का ……….
Sanjivv Shaad

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