प्रो. सेठी की शायरी ऐसे सब तमाशों को बेपर्द करती एक ऐसे समाज के निर्माण की ओर अग्रसर है जिसमें ‘गुंचे गुल बन जायेंगे, फिर गीत बहारे गायेंगे, फिर फूल ना मुरझा पायेंगे’।
प्रो. आर. पी. सेठी ‘कमाल’ का जन्म 1 फरवरी 1944 को हुआ। राजकीय नैशनल महाविद्यालय, सिरसा के अँग्रेजी विभाग से सेवानिवृत्त हुए प्रो. सेठी ने अध्यापन के साथ-साथ साहित्य-सृजन के क्षेत्र में भी अपने विलक्षण हस्ताक्षर दर्ज़ किए हैं। अँग्रेजी-हिन्दी व उर्दू के प्रख्यात शायर प्रो. सेठी ने हरियाणा प्रगतिशील लेखक संघ के संरक्षक के तौर पर अपनी ज़िम्मेवारी का बाख़ूबी निर्वहन किया। 3 जनवरी 2025 को अकस्मात अंतिम विदाई ले गए प्रो. सेठी चाहे आज शारीरिक तौर पर हमारे बीच नहीं रहे परंतु इबादत एवं परिस्तिश का मरकज़ उनकी सांजीदा शायरी हमारा पथ-प्रदर्शन करती रहेगी और प्रो. आर. पी. सेठी ‘कमाल’ की स्मृति सदैव बनी रहेगी।

ग़ालिब, मीर, फ़ैज़, साहिर, डा. इकबाल, रामधारी सिंह दिनकर, कीट्स, कमलादास इत्यादि की शायरी से प्रभावित एवं अपने इर्द-गिर्द के वातावरण, ज़िन्दगी के अकेलेपन व तन्हाइयों से प्रेरित उर्दू, हिन्दी व अंग्रेज़ी में काव्य-सृजन करने वाले प्रो. आर. पी. सेठी ‘कमाल’ अपनी शायरी में ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं के साथ समूची कायनात के दर्द को संजोए हुए हैं। बे-मक़सद शायरी को गुनाह एवं संज़ीदा शायरी को इबादत व परिस्तिश का मरकज़ क़बूल करने वाले प्रो. सेठी के लिए आशाओं, आकांक्षाओं, दिल के ख़्यालों एवं आस-पास घटित होने वाली घटनाओं की कल्पनात्मक एवं सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति ही कविता है। कविता महज़ चोली-दामन की शायरी नहीं बल्कि यह नन्हीं एवं कोमल हथेलियों में विचारों व बगावत के टूटे हुए काँच से खेलने के समान है। साहित्य का समाज, राजनीति एवं विचारधारा से गहन संबंध स्वीकार करते हुए वे कहते हैं कि साहित्य का उद्देश्य महज़ लोकानुरंजन नहीं बल्कि समाज को चेतना प्रदान करना होना चाहिए। साहित्य सृजन के साथ-साथ व्यवहारिक स्तर पर भी अपने सामर्थ्यानुसार सामाजिक चेतना के लिए संघर्षरत रहने के पक्षधर प्रो. सेठी के अनुसार कोई भी संज़ीदा शायर उस निज़ाम का पक्ष नहीं ले सकता जिसने काब्लियत के बावज़ूद इन्सान को लाचार, बेबस एवं उदासीन बना दिया हो। ऐसे निज़ाम पर क़रारी चोट करना ही साहित्य का मुख्य प्रयोजन है। परवाज़ जरूरी है; चाहे पंख टूट ही क्यों न जाएं। इसलिए अनिवार्य है कि साहित्यकार समाज को उसका असली आईना दिखाए। साहित्यिक रचना की गरिमा को बनाए रखने के लिए कथ्य एवं शिल्प दोनों का ही महान होना अनिवार्य है। यह कहते हुए वे इस बात पर बल देते हैं कि लेखन में जल्दबाज़ी नहीं होनी चाहिए। लेखक के लिए चिंतनशील होना अनिवार्य है और इस सबके लिए निहायत ज़रूरी है कि वह अधिक से अधिक अध्ययनरत हो। उनके अनुसार संज़ीदा शायरी के लिए आवश्यक है लेखक हल्के एवं दरबारी लेखन से गुरेज़ करे।
प्रो. आर. पी. सेठी ‘कमाल’ की शायरी ‘तस्सवुफ़’ (दर्शन शास्त्र) एवं ईदराक़ (ज्ञान) की जगह गहन अनुभव की पैदाइश है, जिसके पास ‘ज़माने को ज़माने की हक़ीक़त में हक़ीक़त’ से अवगत करवाने का सामर्थ्य विद्यमान है। इस शायरी में व्यक्तिगत पीड़ा से लेकर समूची इन्सानियत के दर्द, एक ग़रीब बाप से लेकर नग्गल नाव हादसे की दास्तान, गोमती-अवध-लखनऊ से लेकर वियतनाम तक एवं मौसम से लेकर तालिबे-इल्म तक विभिन्न सरोकारों को अभिव्यक्ति हासिल हुई है। इन ग़ज़लों एवं नज़मों में कवि का व्यक्तिगत अनुभव गहनता एवं विशालता का स्वरूप धारण करता हुआ जिस कद्र भरपूर सामाजिक अनुभव में परिवर्तित होकर अभिव्यक्त हुआ है, वह अनुकरणीय, सराहनीय एवं उदाहरणीय है। जहां आदमी मात्र ‘परछाई’ बनकर रह गया हो, ‘संसद’ और ‘मज़हब’ में ‘दलाली’ व्याप्त हो, ज़िस्मों की नुमाइश हो, मज़दूर की ‘बेटी का बदन’, किसी ‘बेवा का सन्दूरी तन’ बिकता हो, गीता ‘बिकती’ हो, दैरो-हरम बिकता हो, जहां कोठियां रात को कोठों की ओर झुकती हों, जहां इन्सानियत की काब्लियत हताश, लाचार और उदासीन हो, ऐसे निज़ाम को नेस्तनाबूद करने के लिए यह कविता ऐसा ‘गूंगा ख़तरा’ बनने का सामर्थ्य रखती है जो ‘माज़ी के ग़लत दौर बदल डालेगा।‘ इस कविता में यह तड़प विद्यमान है कि ‘जिनसे था खौफ़ गुंचा-ओ-गुल को बहार में, वो लोग ही चमन के निगहबान बन गये’ हैं। इस कविता का आह्वान है कि ‘ना नफ़रत से सींचो ये नख्ले-मुहब्बत, कि जल जायेगा ये शजर देख लेना।’ परंतु इस कविता का यह विश्वास भी है कि ‘जो दहशत की बुनियाद पे बन रहे हैं, गिरेंगे बहुत ज़ल्द घर देख लेना’। ‘आज़ादी-ए-आवाम’ का पक्ष लेती यह कविता ‘शहर की कुर्सी से नकाबों के साये’ दूर करने के लिए दृढ़ संकल्पित है। ‘इन्सां इन्सां में फ़र्क करने वाली’, औरत के ज़िस्म को ‘शिवाले’ की जगह ‘ज़ाम’ का नाम देने वाली और वक़्त के साथ कभी समझौता न करने वालों को ‘नाकाम’ लिखने वाली दरबारी कविता को नकारती हुई यह कविता उस लेखनी की पक्षधर बनती है जिसमें ‘लहू में अपने डुबोकर के उँगलियां अपनी, रफ़ता रफ़ता कोई पैगाम लिखा जाता है’। इस शायरी में शौक और मज़बूरी को जिस कद्र व्याख्यायित किया गया है, क़ाबिले-तारीफ़ है। ‘फूल के दर्द’ और ‘चीख़ों भरा सन्नाटा’ जैसा बिम्ब-विधान और नग्गल नाव हादसे के संदर्भ में यह शे’र – ‘नन्हें हाथों से जब लहरों को काटते होंगे, आँखों-आँखों में सभी दर्द बांटते होंगे’ – शायर की प्रगाढ़ एवं संवेदनशील काव्यानुभूति के परिचायक हैं। ‘काली स्याही से छलकती लहू की बूंदों’ से बेचैन इस कविता को उस ‘अख़बार’ का इंतज़ार है ‘सुबह सुबह जो सुकूं’ दे सके। उपभोक्तावादी संस्कृति में इन्सानी ज़िन्दगी को इतना सस्ता होते देख यह कविता ‘इक नई तरलीके-इन्सां’ (मानव-निर्माण) की अनिवार्यता को महसूस करती है क्योंकि ‘अनासिर (पाँच तत्व) से बना इन्सां ही इन्सां नहीं होता।’ उसके लिए संघर्षरत एवं चिंतनशील होना भी ज़रूरी है ताकि वो ‘इल्म-औ-तम्मदुन’ (ज्ञान और सभ्यता) के उस ‘तमाशे’ को पहचान सके जो ‘चाँद से इश्क़ करे और ज़मीं से नफ़रत’। प्रो. सेठी की शायरी ऐसे सब तमाशों को बेपर्द करती एक ऐसे समाज के निर्माण की ओर अग्रसर है जिसमें ‘गुंचे गुल बन जायेंगे, फिर गीत बहारे गायेंगे, फिर फूल ना मुरझा पायेंगे’। आमीन !
द्वारा-:डा. हरविंदर सिंह, ऐसोसिएट प्रोफैसर, राजकीय नैशनल महाविद्यालय, सिरसा

