काव्य कुंज में आज:-डॉ शन्नो देवी आर्य ,”नंदनी”
डॉ शन्नो देवी आर्य ,”नंदनी” 9050342574
पिता का नाम स्वर्गीय श्री अमृतलाल आर्य
शिक्षा – ऍम.ए. (हिंदी , राजनीतिशास्त्र )
ऍम.फिल हिंदी , पी.एच.डी.
व्यवसाय : प्रवक्ता हिंदी
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर राजकीय महाविद्यालय मंडी डबवाली सिरसा
संप्रति : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में काव्य व लघुकथाएं प्रकाशित
सिरसा जनपद की काव्य संपदा
सिरसा जनपद की लघुकथा संपदा में रचनाएं प्रकाशित
शोंक : साहित्य पढ़ना, सामाजिक, प्रेम-विरह, विषयों पर काव्य व लघुकथा लेखन, नृत्य, कुकिंग, पेंटिंग
“क्या पता कौन सी मौज मिटा दे हस्ती मेरी ,
मैं हूँ रेत पर लिखे किसी ब्यां न की तरह “….
जिन्दगी की भागदौड़ , जिम्मेदारियों, परेशानियों की पहुंच से दूर जिन्दगी को करीब से देखने के लिए हर इंसान को अपने लिए वक्त निकालना चाहिए | किसी के हौंसले , सहारे और प्यार से जिन्दगी हँसती हुई लगती है ,मैं हर किसी के साथ एक जुड़ाव महसूस करती हूँ , हर रिश्ते की कदर करती हूँ | वैसे तो जिन्दगी का हर पल बिना रुके गुजरता रहता है, पर जो पल हमारे वजूद में सांसो का एहसास करवाए वो हमारी जिन्दगी की सुंदर याद नहीं हमारी जिन्दगी बन जाते है कभी-कभी इन्ही खुबसूरत बातों को एहसासों को लिखित रूप दे देती हूँ जो महक बिखेरता समय
बीत चुका था ,आज फिर जीने का एहसास दे गया… और अपनी डायरी के पन्नो को दोबारा पलटा जो आप सबकी नज़र है ,जिसके लिए मैं तहे दिल से साधुवाद देना चाहूंगी भाई संजीव शाद जी का जिन्होंने मेरी अलग पहचान बनाने के लिए अपनी बहन का हाथ हमेशा थाम कर रखा है।
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कैलेंडर
एक वक्त हुआ करता था, जब –
मैं,
दीवार में धंसे कील पर
टांगा करती थी,
किलकारियां भरते बच्चे का चित्र |
हँसते फूल,
स्वच्छ नीलाकाश
जिसमे –
उड़ते अनगिनत पंछी
मन कितना प्रसन्न होता था ,
उन चित्रों को
चिकनी दीवार पर झूलते हुए …
देखकर |
फिर वक्त आया –
समय ने रुख पलटा
मैंने देखा ….
दीवार के इसी कील पर,
नशा बिखेरती,
सुंदर सलौनी कोमलांगनियो के चित्र,
उनके रूप की मोहकता,
नयनो की मादकता
के वशीभूत हो –
मैं –
सपनों की दुनिया
में,
उड़ने लगी |
देखने लगी,
तलाशने लगी,
इस टंगे कैलेन्डर
मैं –
अपनी,
इच्छाओ को, आकाक्षाओं को |
अचानक आज –
इस कील पर,
एक मेहनतकश रिक्शावाले का,
चित्र टंगा है |
रिक्शा वाला जो
स्वंय,
समय की सपाट दीवार पर,
भूख की लम्बी कील में,
टंगा हुआ है |
मन में सोचा –
जैसे –
वह,
जूझ रहा हो,
समय से ,
दिनों से ,
तारीखों से, और-
और भटकता फिरता हो,
पेट की आग से,
विचलित गली गली में |
मैं-
इस कैलेंडर की कड़वी,
सच्चाई को,
अपलक निहारती हूँ |
सोचती हूँ,
इसके बाद यहां कौन सा,
कैलेंडर टांगू,
जिसमें
आज के वक्त की
सही पहचान हो सके |
यकायक-
मुझे लगा
मैं-
स्वयं ही
इस कील पर
टंग गयी हूँ |
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मेरे देश का बचपन भूखा है
कुछ नहीं सोचते, तो बहुत कुछ हो
चुका होता है-
सोचते हैं, तो उम्मीद ही खत्म
नहीं हो पाती |
एक दिन बस यूं ही सोचते-सोचते
मन में मैंने सोचा
इस देश में जहां, भूख का नंगा नाच हो होता
एक वक्त का कमाते हुए दूसरे वक्त की हो चिंता
जहां एक मुट्ठी भर चावल के लिए
धर्म हो बिकता
जहां आदमी भूखा पैदा होता,
और भूखा ही मरता
तो क्या किया जाये ?
लिख दो हजारों नन्हें हाथों पर
जो खिलौनों से नहीं खेलते
रोते बिलखते छोटे भाई बहिनों को
गोद में है खिलाते
लिख दो नन्हे हाथों पर
जो कापी किताबों, स्लेटों के बदले
तवे, बर्तन, बूट
मांजते, चमकाते हैं
घर पर, दुकानों पर-
यदि ध्रुव प्रभु भक्ति में न रमाए अपना मन
दो वक्त की रोटी जुटाने में जुट जाए
यदि अभिमन्यु
भूख, प्यास, अभाव के चक्रव्यूह में अपना
दम तोड़ जाए-
गुरु गोविंद के पुत्र
भूख की एक-एक ईंट में चुन दिए जाए
तो मेरे देश का यौवन क्या होगा ?
मेरे देश का बचपन
कभी पेट की भूख के लिए रोया,
कभी प्यार की प्यास के लिए तरसा
कभी मां की ममता को, पिता के दुलार को
कभी बहिन के स्नेह को कभी अध्यापक की पुचकार को
इस तरह तरसते, मन मसोसते
विदा होता है – मेरे देश का बचपन
सभी भावों के बदले
रह गया सिर्फ एक क्रंदन
मेरे देश का बचपन भूखा है-2
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प्यास
रात सपने में मैंने देखा,
लोग बैठे थे, एक बस्ती में,
आग के चारों तरफ,
और चांद बन गया मुद्दा बातों का |
छोटे बच्चे ने कहा, मामा है |
कई दिनों से बीमार बूढ़े ने कहा,
ये दवाई की गोली है, जो दी थी मुझे
डॉक्टर ने कल
मगर इसका कोई फायदा न हुआ |
एक औरत, जिसका पति अभी मरा था
दो या तीन महीने पहले,
उसने चाँद को कह दिया
अपनी खोई हुए माथे की बिंदिया |
वहीं बैठे एक युवक को लगा यह,
अपनी प्रेमिका का चेहरा,
चार दिन के भूखे को चाँद
रोटी बन कर नजर आया
एक अपाहिज भिखारी ने कहा-
ये वो पैसा है, जो कभी-कभी कोई
मेरे कटोरे में डाल देता है,
सिर्फ मैं- अकेली थी,
चाँद को चाँद कहने वाली |
ख्वाब टूटने पर सोचा,
यह सब उनके वहम थे
या-
मैं वहम मे थी |
शायद मैं नहीं जानती |
मगर चमकती रेत को दूर से पानी
समझ लेने में, कोई गलती नहीं है
प्यास चीज ही ऐसी है
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पिता
नंदू आज पापा नहीं रहे
उसके शब्द सुनकर
मेरा सब दुःख उभर आया
याद आया जब
मेरे पिता भी नहीं रहे थे / पर
मेरे और उसके परिवार में फर्क है
मेरे पिता
ज़िन्दा हैं आज भी
घर के कण – कण में
हमारी स्मृतियों में,
और उसके पिता को अंतिम बार विदा करते हुए
थैले में डाल टांग दिया
गाड़ी की
खूंटी पे-
कोई चीज़ समझकर
जो पिता जन्म देकर,
गोद में खिलाता रहा
आज उसी पिता के
बेटों ने कर दिया
गोद से वंचित उसे
सच है आज रिश्ते रिस रहे हैं
रिश्ते-स्वार्थ के
रिश्ते-रुपयों के
मरता तो कोई नहीं
जब तक हम मन से
याद रखें
इंसान तब मरता है
जब हम भूल जाते हैं
पर
पिता भूलने
वाली चीज़ नहीं
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धुएँ के शहर में
अनजान-
सफर पर चली हूं मैं
रास्ते में रोक कर जो हाल मेरा पूछे
इस सफर में इन दरख्तों के सिवा कोई नहीं |
आज धूप कुछ इस कदर खिली है
इस सरसों सी खिली धूप में,
दूर धान के पके हुए खेतों के बीचों-बीच
इस सफर के दौरान
मैं अपनी मासूम हंसी छोड़ आई हूं |
लेकिन
उन-
खेतों, उन यादों, उन दरख्तों
को पीछे छोड़ने पर
मुझे कुछ नहीं मिला
इस धुएँ के शहर में-
कोहरे के सिवा |
लगती है देखने पर
मुंह खोले भूतों की सी परछाइयाँ
चारों ओर मिलो की चिमनियाँ
ऊँचे-ऊँचे इमारती मकान
जो देखने पर दूर तक सटे हुए हैं |
दूर तक सांप की तरह रेंगती सड़कें
तंग गलियों में किलबिलाते लोग
फुटपाथो पर लेटे अजनबी चेहरे |
ये सब जब देखती हूँ
तो लगता है
जैसे बस एक पोस्टर की तरह है
जो दूर
बस स्टैंड पर टंगा है
मैं
देख रही हूँ
खड़ी खड़ी
उस ऊँची-ऊँची इमारतों को
जो काले आकाश की चांदनी में
ढकी हुई है |
और
मैं-
इस कोहरे में
धुए के शहर में
अकेली भागी जा रही हूँ |
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लड़की
मैं लड़की हूँ
बचपन में
बहुत खेलती थी घर-घर,
तब पता नहीं था
घर-घर का खेल
क्या होता है
गुड़िया को चुन्नी ओढ़ाना
उसके ब्याह की चिंता
आज यौवन आने पर
घर-घर की गुड़िया की कहानी
चरितार्थ हो रही है
माँ को अपनी गुड़िया की चिंता हो रही है
ससुराल के नियम
हिदायतें सब
मुझे ही समझाई
जा रही हैं
सिर पर दुपट्टा
ओढ़ने का
सास-ससुर के
चरण-स्पर्श का |
देवर की चुटकियों का
ननद की अठखेलियों का
मुँह में जुबान न रखने
का
भाषण
मुझे ही सुनाया जा रहा है |
सारे रिश्ते निभाने के संस्कार,
मुझे ही बताए जा रहे हैं
एक परिवार को
छोड़
दुसरे परिवार में
जाकर संस्कारों के
बंधन में मुझे ही
फंसाया जा रहा है
क्यों
सोचने पर मजबूर हूँ मैं
क्योंकि
मैं
एक लड़की हूँ |
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यादें
“मेरा वो समय,
वो पल –
जो –
सिर्फ तुम्हारी यादों की वजह से
जल जल कर नष्ट हुआ है |
उसकी राख कभी – न – कभी ,
तेज़ हवाओ के साथ उड़कर
तुम तक जरुर पहुंचेगी
और – पैदा करेगी तुम्हारी आँखों में किरकिरी ,
तब तुम्हें – एहसास होगा
कि – यादों में जीना,
कितना मुश्किल होता है – |”
[6/8, 17:19] Shano Arya: *अक्सर*
“अक्सर जब मैं,
छत पर जाती हूं,
तुम दूर होते हो,
तुम्हें अपने पास ही पाती हूँ |
सोचती हूं क्या चांद भी,
कभी दूर हुआ है चांदनी से ||
मिल कर साथ
बातें करते थे,
तुम्हारे कहे शब्द
मेरे लिए बन गए हैं तारे,
रोज – छत पर,
उन्हें ही तो पढ़ने जाती हूँ
दुनिया की नज़रें मज़ाक उड़ाती है,
इसलिए-
धरती पर नहीं,
आकाश में मिल आती हूँ,
एक ही पल में-
पूरी जिंदगी जी आती हूँ ”
*** *********************
फाँसले
जब-
तुम पास होते हो,
सूनापन सिमटकर गुम हो जाता है,
जैसे – सूर्य के उदय होते ही
कोहरा –
मेरा दम इसलिए घुटता कि
तुम पास नही होते-
इसलिए –
कि-
दूर होने से फाँसले
बढ़ने का डर रहता है
*********************
पैबन्द
एहसास को
अल्फाज में
कहना तो मुश्किल है,
मगर ए दोस्त
तुमने
कुछ दिया तो जरूर है |
दिया है-
जिंदगी को नया सृजन,
नई मुस्कुराहट,
नया अपनापन,
नये खूबसूरत पल
नये दिन, नई सुबह
नई शामें नए रतजगे,
और सबसे खूबसूरत
जिंदगी के दामन
में नये
पैबन्द
***************
पाती
आज भी,
वो स्मृतियां अंकित है,
मेरे
मानस-पटल पर
जिन्हें चाहकर भी
दूर नहीं कर पाती मैं,
न जाने क्यों….?
आज भी आँखों की कोरे
भीग जाती है-
मेरे
शब्द फिर से अनकहे हो जाते हैं
पराये लोगों की तरह-
इस बरस सावन में क्यों ?
नहीं आई पाती तुम्हारी ?
लिखना मत, बस
भेज देना कोरा काग़ज मेरे लिए
क्योंकि-
एक दूसरे में भीगना ही जीवन है –
अब हम एक हैं
मैं और आप
जीने के लिए
इतना ही बहुत है
********************
पल
चेहरे की चमक
क्षीण होती जा रही है,
होठों की हँसी
भागती जा रही है-
आंखों में बेबसी
के बादल गहरा रहे हैं,
कितना भी रोको
फिर भी छाते जा रहे हैं-
इक रोज जहां छलकते थे
खुशियों के पल तेरे लिए
हर सुबह, हर शाम
लिख गए वह पल
तेरे नाम |
आज भी उमड़े
पर खुशी के पल बनकर नहीं
आंखों के सावन बनकर
रह-रह कर बरस
जाएगें-
दो-चार फिर नए सफे-
तेरे नाम लिख-
जाएगें-
********************************
बीमारी
हर पल उसके कमरे से खाँसने की आवाज आती रहती । ऐसा लगता था कि वो मौत को मोड़ने में हर बार कामयाब हो गई हो । नंदा कुछ समय उसके पास व्यतीत करने जरूर जाती। ढेर सारी बातें करती।
‘ क्या, मौसी इतना मत सोचा करो, तुम जल्दी ठीक हो जाओगी ।’
‘नहीं, नंदा झूठा भरोसा मत दे, अभी तो बहू के सिर से वार कर पानी भी नहीं पिया मैंने, ना ही इस घर आंगन में पोती-पोते की किलकारियाँ सुनी है मैंने । अब तो सोचती हूँ मर जाऊँ तो अच्छा है कहीं बेटे की शादी के लिए रखे रुपये मेरी बीमारी ना खा जाए।’
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उन्हीं के लिए
ट्रेन की सीटी बजी और पहिये घूमने लगे । सारे डिब्बे ठसाठस भरे हुए थे । एक लड़की पत्थर के दो छोटे टुकड़ो से संगीत उत्पन्न कर कुछ गा रही थी, उसके गले में सरस्वती का वास था । बुल्लेशाह के कलाम गाकर हर किसी के सामने हाथ फैलाकर सिद्ध कर रही थी, की कला किसी की मोहताज नहीं । जिसने जो दिया सहर्ष ले लिया।
मेरे पास आई तो मैंने पूछा, ‘कोई मजबूरी है क्या? तुम्हारे माता-पिता नहीं है?’
उसने सारे रुपये अपनी पोटली में डाले और माथे का पसीना पोछते हुए कहा, ‘हैं ना-उन्ही के लिए तो करती है सब ।’
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भुलक्कड़
कमरे में दो चारपाइयाँ बिछी थी, बीच में से थोड़ा रास्ता था आने जाने के लिए | दाहिने हाथ की दीवार पर कुछ मैले कुचले कपड़े खूंटी पर टंगे हुए थे । चार बर्तन और मटके में पानी के सिवाय और कुछ नहीं था । बूढ़ी मां जिसकी आँखों की रोशनी भी मद्धम पढ़ रही थी- सहसा एक आवाज से उसका ध्यान टूटा।
‘आज भी चेतन मिलने नहीं आया ।’ बूढ़े ने अत्यंत दु:ख से कहा ।
‘हाँ, उसको बहुत काम रहता है, सुना है बड़ा अफसर है ना, किसी से बात करने का भी समय नहीं है अब तो उसके पास ।’
‘रामू का बेटा मिला था, कह रहा था, ‘बहुत बड़ा बंगला बनाया है, बड़े-बड़े कमरे हैं, गाड़ी के लिए अलग जगह, लॉन है, बच्चों के कमरे भी अलग बनाए हैं । बूढ़े ने खांसते हुए बूढ़ी को जिज्ञासा से सारी बात बताई ।
‘सोचा था बुढ़ापा आ गया है, समय का सूनापन पोती-पोतों के साथ कट जाएगा, उसे पढ़ाते-पढ़ाते, उसकी जरूरतें पूरी करते-करते बाल सफेद हो गए । पर बचपन की आदत नहीं गई उसकी भुलक्कड़ है ना भूल गया होगा हमारी जगह का कमरा बूढ़ी भी खाँसने लगी कमरे में फिर घुटन पसर चुकी थी
पसीना
‘आज तो तुम लोगों ने कवि-सम्मेलन में जाना है ना बहू ?’ लीला ने अपनी बहू से कहा |
‘हाँ, माँ जी जाना तो है पर इस जेठ की गर्मी ने बुरा हाल कर रखा है और अभी रसोई का सारा काम पड़ा है |’ मौसम की गर्मी और अपने काम न करने की मंशा बहू ने जाहिर की |
‘कोई बात नहीं बहू तुम तैयार हो जाओ आठ बजे का तो कार्यक्रम है, मैं संभाल लुंगी |’
बेटे ने प्रवेश करते ही कहा, ‘माँ देख नहीं रहे कितना पसीना ढलक रहा है इसके शरीर से | ये काम तो आप भी कर सकती थी |’
और माँ की आँखों में आँसू थे वो मन ही मन सोच रही थी, ‘इतने सालों से माँ ने पाल-पोसकर बड़ा किया कभी माँ का पसीना उसे एक पल के लिए भी नज़र क्यों नहीं आया
डॉ शन्नो देवी आर्य ,”नंदनी”



Unknown
June 9, 2020 at 4:39 pm
ਬਹੁਤ ਖੂਬ ਵਾਹਹਹਹ
Unknown
June 9, 2020 at 4:39 pm
ਬਹੁਤ ਖੂਬ ਵਾਹਹਹਹ