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काव्य कुज :-हरीश सेठी झिलमिल

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सिरसा के साहित्यकार जनाब 
“हरीश सेठी झिलमिल “

परिचय :          हरीश सेठी ‘झिलमिल ‘


शैक्षिक योग्यता :  एम. ए.(हिंदी,समाजशास्त्र, इतिहास),बी.एड.,डी.एड. प्रभाकर,
हरियाणा राज्य पात्रता परीक्षा (हिंदी, समाजशास्त्र)

सम्प्रति : प्रवक्ता समाजशास्त्र

विशेष  : मंच संचालक

सचिव, हरियाणा प्रादेशिक हिंदी साहित्य, सम्मेलन, सिरसा।


सचिव,   महादेवी कौशिक बाल साहित्य संस्थान, सिरसा

सह संयोजक   हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच, सिरसा

सचिव,   लघुकविता मंच, सिरसा

प्रकाशन: 
*सिरसा जनपद की लघुकथा संपदा का संयोजन।
* सम्पादन :बहुआयामी व्यक्तित्व:रूप देवगुण
* विभिन्न स्थानीय तथा राष्ट्रीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं एवं ऑनलाइन पटलों पर बाल- कविताएँ, लघुकथाएँ, कविताएँ, लघुकविताएँ, साक्षात्कार, फीचर लेख,संस्मरण,हाइकु, तांका, सेदोका, दोहा,पिरामिड आदि प्रकाशित।

* पुरस्कार/सम्मान: विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक, शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कार,सम्मान।



बाल कविता 
                             चाँद

                       बचपन में
                        सुनी थी
                     एक कहानी
                        चाँद पर 
                   चरखा कातती है 
                     बुढ़िया रानी
                     विज्ञान पढ़ा 
                       तो पाया 
                      फिर प्रश्न 
                    मन में आया
                   न हवा, न पानी
                फिर कैसे रही होगी
                   बुढ़िया सयानी
                 किसी को चाँद में
                दाग नज़र आता है
                    तो कोई उसे
                   शशि कहकर 
                      बुलाता है
                    आसमान में 
                 चंदा संग चमकते 
                 अनगिनत तारे हैं
                   रात्रि में लगते 
                     सुंदर सुंदर
                    प्यारे प्यारे हैं
                  गौर से देखो तो 
                     प्रकृति का 
                 अजब नज़ारा है 
              चाँदनी बिखेरता चाँद 
              इक अद्भुत सितारा है



 लघुकथा       
                   पड़ोस-धर्म 
 
        बालक सुरजीत का फैंका पत्थर मोहित की आँख के पास लगा। बेटे की चीख सुनकर मम्मी-पापा दौड़े-दौड़े आए। देखा, लहू टपक रहा था। तुरंत डॉक्टर के पास ले गए। मोहित की आँख के पास दो टाँके लगे। पड़ोस में रहने वाले मुख्तयार सिंह व उनकी पत्नी गुरमेल कौर बहुत डर रहे थे। पत्थर उन्हीं के पोते सुरजीत से लगा था। सुरजीत भी सहमा हुआ था। दरवाजे पर थोड़ी सी भी आवाज़ होती तो वे काँप जाते। लगता मोहित के मम्मी-पापा उलाहना देने और लड़ने आए हैं।
        जब बहुत देर तक कोई नहीं आया तो मुख्तयार सिंह गुरमेल के साथ मोहित के घर पहुँचे। वे सहमे-से बोले “राजीव बेटा, मोहित का क्या हाल है?”
               “ठीक है अंकल जी, दो टाँके लगे हैं। जल्दी ही पूरी तरह ठीक हो जाएगा।”
             “क्षमा चाहते हैं बेटे, हम तुरंत नहीं आ सके…असल में हम बहुत डर गए थे। पर तुम तो उलाहना तक देने भी नहीं आए।” गुरमेल कौर बोली।
“उलाहना किस बात का आंटी जी!  सुरजीत बच्चा है, बच्चों से अक्सर ऐसी गलतियाँ हो जाती हैं।फिर आपने भी तो सुरजीत को डाँटा व समझाया होगा।”मोहित की माँ बोली।
       “हाँ, हाँ, वो तो हमने उसे डाँटा भी है और समझाया भी है।” मुख्तयार सिंह बोला।
            “आप मोहित का पता लेने आ गए, हमारे लिए यही काफ़ी है।” मोहित की माँ बोली।
“वह तो आना ही था, बेटे, मोहित भी तो हमारा ही बच्चा है…शुक्र है बेटे की आँख बच गई।”
“आप लोग खड़े क्यों हैं, बैठिए ना, थोड़ी-थोड़ी चाय पीते हैं, बहुत दिनों बाद आए हैं आप।” राजीव बोला तो वे मना नहीं कर सके।
मोहित की माँ चाय के लिए पहले ही रसोई में जा चुकी थी। 
चाय की चुस्कियाँ लेते हुए मुख्तयार सिंह व गुरमेल कौर की आँखें नम हो गईं।

कविता

जीवन का अंतिम पड़ाव

जीवन के
अंतिम पड़ाव पर 
बैठी स्त्री
स्मरण करती है
बार बार
बचपन से
बुढ़ापे तक का सफर
संन्यास आश्रम की
इस पगडंडी पर
अनायास ही
सजीव हो
उठते हैं
चित्र
आँखों के सामने
पिता,पति ,पुत्र
के प्रतिबंध
मीठे,खट्टे, कड़वे पल
माँ, बहन,बेटी,बहू
संग बिताया
एक एक पल
बूढ़ी नज़र
बीनती कंकर
वृद्ध काया 
करती मूल्यांकन
जीवन में
क्या खोया
क्या पाया।
 प्रकृति

प्रकृति ने दिये 
हमें अनेक उपहार
वायु ,जल है 
जीवन का आधार
नदियों, पहाड़ों की 
छटा निराली
सूरज बिखेरता  
अपनी लाली
पृथ्वी में 
खनिज लवणों की भरमार
अन्न का 
भर देती यह भण्डार
चाँद सितारों का  
अलग अंदाज
आकाश लगता जैसे 
सिर पर ताज
पशु पक्षियों का है 
अजब संसार
पेड़ भी करते 
हम पर उपकार
खिलते सुंदर 
बगीचे और बाग
मस्त पवन गाती 
अपना राग
प्रकृति का 
नहीं है कोई सानी
सबने इसकी 
महत्ता जानी
प्रकृति के 
संसाधनों को बचाना है
सुंदर पर्यावरण  
बनाना है

अंदाज़-ए-बयाँ

ये जहां कभी कभी  वीराना लगता  है
कोई कोई शख्स यहाँ बेगाना लगता है

चल  रही  हैं  नफ़रतों  की  आँधियाँ
सहमा सहमा  ये  जमाना  लगता  है

कश्ती डुबोई  थी  समंदर में  जिसने
गुनहगार  वह  पहचाना  लगता   है

सूनी  सड़क  पर  हैं  बिलखते  बच्चे
टूटा  हुआ  कोई  घराना  लगता  है

सहम  गया  बात  करते  करते  वो
सच कहने का तो जुर्माना लगता है
             
 –हरीश सेठी ‘झिलमिल’



बाल कविता

 आत्म संवाद

नंगे पाँव 
पैबंदी फ्रॉक
बिखरे बाल
बहन की देखभाल
क्या यही है मेरी कथा
किसे सुनाऊँ अपनी व्यथा
माँ को तो सुबह बोला था
अपना मन झिझकते खोला था
माँ मुझको नई फ़्रॉक दिला दो
मैं भी पढ़ने जाऊँगी
पढ़ लिख कर माँ मैं भी
खूब नाम कमाऊँगी
माँ बाबा तुम इतनी मेहनत करते
फिर भी पेट हमारे आधे ही क्यूँ भरते
हम इतनी ईंटें बनाते,लोगों के घर बन जाते हैं
पर हमारे ही घर क्यों नहीं बन पाते हैं
माँ ने मुझे बताया था ,कुछ ऐसे ही समझाया था
अभी तू छोटी है ,समझ नहीं पाएगी
जब बड़ी हो जाएगी तो खुद समझ आएगी
बस एक बात ध्यान रखना, इधर उधर मत जाना
मुन्नी रोये तो चुप करवाना,शीशी से तुम दूध पिलाना
मैं थोड़ी सी डोली थी,माँ से यूँ बोली थी
माँ मैंने किया खूब अभ्यास
मिट्टी के बनाए हैं सुंदर गिलास
मैं तुम्हारा हाथ बटाऊंगी
ईंटें भी मैं खूब बनाऊँगी
मेरे माँ बाबा बहुत न्यारे
मुझको लगते हैं बहुत प्यारे
नई फ़्रॉक लाएँगे
स्कूल में प्रवेश दिलाएँगे

          हरीश सेठी ‘झिलमिल ‘

4 Comments

  1. Rakesh jain

    June 26, 2020 at 3:27 pm

    वाह!बहुत खूब हरीश जी,बहेतरीन प्रस्तुति?
    आद.संजीव जी भी बधाई के पात्र?

    Reply

  2. Rakesh jain

    June 26, 2020 at 3:27 pm

    वाह!बहुत खूब हरीश जी,बहेतरीन प्रस्तुति?
    आद.संजीव जी भी बधाई के पात्र?

    Reply

  3. बिलकुल राकेश जी,संजीव शाद जी बधाई के पात्र हैं।बहुत शुभकामनाएँ शाद जी को।

    Reply

  4. बिलकुल राकेश जी,संजीव शाद जी बधाई के पात्र हैं।बहुत शुभकामनाएँ शाद जी को।

    Reply

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