कभी कभी मकसद नही होता है
तब भी कोई सफर होता है
घर की दीवारे खड़ी तो हो जाती है
घर में कोई अपना हो तो ही घर होता है
दुया सलाम जरूरत की हो जब
तब रोज इक नए रिश्ते का जन्म होता है
भटकता रहता है दर दर वो फकीर बन कर
सूखे पत्ते का सफर अपनीमर्जी का कब होता है
सोचा कुछ देखा कुछ और समझा कुछ
अकेला हूँ लेकिन मुझमे भी कुछ छुपा होता है
कुछ छुपा होता है
कभी कभी मकसद नही होता है
तब भी कोई सफर होता है
घर की दीवारे खड़ी तो हो जाती है
घर में कोई अपना हो तो ही घर होता है
दुया सलाम जरूरत की हो जब
तब रोज इक नए रिश्ते का जन्म होता है
भटकता रहता है दर दर वो फकीर बन कर
सूखे पत्ते का सफर अपनीमर्जी का कब होता है
सोचा कुछ देखा कुछ और समझा कुछ
अकेला हूँ लेकिन मुझमे भी कुछ छुपा होता है
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