खुद के चित्र
अजीब होते है
शायद बनावटी झूठे
या जो इंसान खुद होता वैसे नहीं होते
मैं बहुत खुश होता हूँ आपनी तस्वीर देख के और काफी बार घर की दीवारो पे सजाई है बड़ी करवा के आपनी फोटो
कैमरे के आगे सारी दुनिया खूबसूरत होती है
आप भी शायद ……..
लेकिन दर्पण झूठ नहीं बोलता क्योकि दर्पण में जो तस्वीर बनती वो तब तक होती है जब तक कोई उसके सामने होता है और इसलिये कैमरे की तस्वीर से अलग दर्पण की तस्वीर देखना मुश्किल है
है न दोहरी ज़िन्दगी मुखोटों की ज़िन्दगी
कोशशि करूँगा हिम्मत भी किसी तरह मेरी दर्पण वाली तस्वीर का प्रिंट मिल जाये
और फेस बुक पे डाल के आपके विचार ले सकु ….. और घर की दीवारो पे लगी मेरी झूठी तस्वीरों को फाड़ के उस स्थान पे लटका दूँ और प्रणाम करूँ…….(मेरा निजी विचार)
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