मित्र हो तुम
मैंने तुम्हे कभी देखा नहीं है
कितने दूर हो तुम
बस आपके और मेरे बीच इक विचार
का ही रिश्ता है
विचार
आधार है संस्कार का
व्यक्तित्व का
बस तुम विचार के बीज बो दो
ताकि वो
आने वाली पीढ़ी के कुछ काम आ सके
और मित्रता के अर्थ को समझ सके
सर्फ जानना ही नही है
इक दूसरे को पहचाना भी तो है
इसलिए मित्रो की भीड़ नही होती
और भीड़ कभी अच्छी नही होती
बस
मेरी महोबत नही बल्कि उससे बड़ कर
इबादत हो तुम सब
क्योकि
मैं तुम सबको पहचानता हूँ
और तुम्हारे शब्दों के अर्थो
को जनता हूँ
इक
सुदामा बन कर……..Sanjivv Shaad
Check Also
खेलकूद से पैदा होती है अनुशासन की भावना: डा. संदीप गोयल
जीएनसी सिरसा में नैशनल स्पोर्ट्स डे पर हुआ आयोजन सिरसा: 29 अगस्त: व्यक्तित्व के सर्वांगीण …

