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मैं हूँ कच्ची मिट्टी

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मैं हूँ कच्ची मिट्टी…………….
पाँच तत्व में इक तत्व है
मिट्टी…..कच्ची मिट्टी
मिट्टी की अपनी धरोहर है
मिट्टी का अपना इक रिश्ता है
मिट्टी का अपना इक विशवास है
शिल्पकार के हाथो तराशी मिट्टी
तख्तो ताज पे बैठ कर नाज़ करती है
हवाओ में उड़ती फिरती है
पैरो में घुँगरू की तरह नाच करती है
जीवन के कितनो रंगो में ढल जाती है
इक कच्ची मिटटी
मैं हूँ कच्ची मिटटी…….
हमारा वजूद भी मिट्टी
हमारी जात भी मिट्टी
आखिर मिट्टी ने मिट्टी में मिलकर हो जाना मिट्टी
कुछ मिट्टी बन के हवा  में उड़ जाना
कुछ ने पानी में बह जाना
बस बन कर कच्ची मिट्टी
मैं हूँ कच्ची मिट्टी…………..
वक्त की थापी से कुटी गई पीसी गई
चक्कर पे घुमाई गई आग में जलाई गई
और बिखेरी गई मैं कच्ची मिटटी
सूरज चमके तो तप जाऊँ
पानी बरसे तो गल जाऊँ
आंधी आये तो उड़ जाऊँ
बच्चों की भोली गुड़िया मेरे क्या अपनी हस्ती
मैं हूँ कच्ची मिट्टी……….
मैं मिट्टी रो दूँ तो पतझड़ आ जाये
मैं मिट्टी हँस दू तो मधुऋतु छा जाये
नाच दिखाऊ तो अम्बर झूमे
रूठ जाऊ तो तांडव हो जाये
मिट कर भी मिट्टी हो जाऊ
मैं हूँ कच्ची मिट्टी…………..
बून्द बून्द था उम्र का दरिया
कण कण थी जिस्म की मिट्टी
मुठ्ठी में रेत की तरह फिसल गई
खुद समेटी न गई
मैं इक कच्ची मिट्टी…….
कोई करे नफरत तो मिट्टी में मिला दे
कोई करे प्रेम तो भगवान बना दे
राजा रानी कथा कहानी
बुढ़ापा बचपन और जवानी
कितने रंग रूप बदलकर
रोज जीती रोज मरती
मैं इक कच्ची मिटटी……
आपने हाथो से गुन्दना मुझको
और इक बूत बनाना
और चौक पे लगाना
आपने बच्चों को मेरी जीवन कथा सुनना
बस इतना ही कहना
ये भी थी इक मिट्टी
इसे भी जीवन के सांचे में डाला गया
पीटा गया जोड़ा गया तोडा गया
उम्र भर  मिट्टी रहा मिट्टी था और मिट्टी में ही मिल गया बस बन के इक कच्ची मिट्टी
मैं इक कच्ची मिट्टी………

4 Comments

  1. शब्द मसीहा

    July 27, 2015 at 9:30 am

    Very nice Bro

    Reply

  2. शब्द मसीहा

    July 27, 2015 at 9:30 am

    Very nice Bro

    Reply

  3. TO THE POINT SHAAD

    July 27, 2015 at 10:17 am

    जनाब आप का प्रेम और आशीर्वाद

    Reply

  4. TO THE POINT SHAAD

    July 27, 2015 at 10:17 am

    जनाब आप का प्रेम और आशीर्वाद

    Reply

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मैं हूँ कच्ची मिट्टी

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मैं हूँ कच्ची मिट्टी…………….
पाँच तत्व में इक तत्व है
मिट्टी…..कच्ची मिट्टी
मिट्टी की अपनी धरोहर है
मिट्टी का अपना इक रिश्ता है
मिट्टी का अपना इक विशवास है
शिल्पकार के हाथो तराशी मिट्टी
तख्तो ताज पे बैठ कर नाज़ करती है
हवाओ में उड़ती फिरती है
पैरो में घुँगरू की तरह नाच करती है
जीवन के कितनो रंगो में ढल जाती है
इक कच्ची मिटटी
मैं हूँ कच्ची मिटटी…….
हमारा वजूद भी मिट्टी
हमारी जात भी मिट्टी
आखिर मिट्टी ने मिट्टी में मिलकर हो जाना मिट्टी
कुछ मिट्टी बन के हवा  में उड़ जाना
कुछ ने पानी में बह जाना
बस बन कर कच्ची मिट्टी
मैं हूँ कच्ची मिट्टी…………..
वक्त की थापी से कुटी गई पीसी गई
चक्कर पे घुमाई गई आग में जलाई गई
और बिखेरी गई मैं कच्ची मिटटी
सूरज चमके तो तप जाऊँ
पानी बरसे तो गल जाऊँ
आंधी आये तो उड़ जाऊँ
बच्चों की भोली गुड़िया मेरे क्या अपनी हस्ती
मैं हूँ कच्ची मिट्टी……….
मैं मिट्टी रो दूँ तो पतझड़ आ जाये
मैं मिट्टी हँस दू तो मधुऋतु छा जाये
नाच दिखाऊ तो अम्बर झूमे
रूठ जाऊ तो तांडव हो जाये
मिट कर भी मिट्टी हो जाऊ
मैं हूँ कच्ची मिट्टी…………..
बून्द बून्द था उम्र का दरिया
कण कण थी जिस्म की मिट्टी
मुठ्ठी में रेत की तरह फिसल गई
खुद समेटी न गई
मैं इक कच्ची मिट्टी…….
कोई करे नफरत तो मिट्टी में मिला दे
कोई करे प्रेम तो भगवान बना दे
राजा रानी कथा कहानी
बुढ़ापा बचपन और जवानी
कितने रंग रूप बदलकर
रोज जीती रोज मरती
मैं इक कच्ची मिटटी……
आपने हाथो से गुन्दना मुझको
और इक बूत बनाना
और चौक पे लगाना
आपने बच्चों को मेरी जीवन कथा सुनना
बस इतना ही कहना
ये भी थी इक मिट्टी
इसे भी जीवन के सांचे में डाला गया
पीटा गया जोड़ा गया तोडा गया
उम्र भर  मिट्टी रहा मिट्टी था और मिट्टी में ही मिल गया बस बन के इक कच्ची मिट्टी
मैं इक कच्ची मिट्टी………

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