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रफ्तार …कविता

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कविता:-रफ्तार

वक्त के दिए घाव 
जल्द ही भर जाएंगे
संकट के जो छाए बादल,फ़िर बरस के प्यास मिटाएंगे।
मानवता के बड़े पुजारी,
फ़िर दौड़ के आएंगे।
आर्थिकता की करने भरपाई
नया आतंक मचाएंगे।
तेज करके अपनी रफ़्तार
प्रकरती को फ़िर पीछे कर जाएंगे।
मुश्किल से मिली आजादी की भूख को शोषण से मिटाएंगे।
स्वछंद पक्षी नील गगन के केद
में हो जाएंगे।
पावन बहती गंगा मैया को
पाप से भर जाएंगे।
धरती की बोटी बोटी को नोच नोच के खाएंगे।
मानवता के बड़े पुजारी फ़िर मैदान में आएंगे।
Sweeni garg

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