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सावन……की बरसात

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इक उम्र
और ख्बाव और अहसास व्
अपनापन
जैसे कुछ शब्द जब मेरे आसपास होते है
तो मैं खुद को खुदा समझता हूँ
वापिस लौट जाता हूँ उसी मुहल्ले की गली में
जहां बचपन में बरसात होती थी
और मैं भीगता नही नहाता था
पानी में अपने पैरो को जोर जोर से पटकता था
जो पानी उस वक्त उछलता था
वो
ही मेरी आशा और परिभाषा थी जीवन की।
बरसात तो आज भी होती है गली भी वहीँ है पानी भी रुकता है
मैं पैर सम्भल के रखता हूँ और भीगने से बचने के लिए छाता रखता हूँ
और शायद इसलिए मेरे जीवन की आशा और परिभाषा कही गुम है
मन तो करता है फिर सोचता हूँ की
लोग क्या कहेगे ।
ये शब्दों ने जिंदगी के अर्थ बदल दिए।
लो मैंने पक्का मन बना लिया है
इस बार सावन की बरसात में
खूब पैरो से पानी उछलुगा ……शायद
आशा के साथ जीवन की परिभाषा  लौट आये
बस तुम दुया करना सावन समय पे आ जाये ।।

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