नाम : राजकुमार निजात.
जन्म तिथि : 1अप्रैल 1953.
जन्म स्थान : सिरसा ( हरियाणा )
माता-पिता : ( दिवंगत ) श्रीमती विद्या देवी,वैद्य बीरबल दास .
शिक्षा : एम. ए. ( हिंदी ), विद्यावाचस्पति , विद्यासागर ( मानद )
प्रकाशित साहित्य : दस लघुकथा-संग्रहों सहित 1000 से अधिक लघुकथाओं का
लेखन : —
कटा हुआ सूरज ,
बीस दिन ,
अदालत चुप थी ,
उमंग उड़ान और परिन्दे ,
नन्ही ओस के कारनामे ,
दिव्यांग जगत की 101 लघुकथाएं ,
माँ पर केंद्रित 101 लघुकथाएं ,
आसपास की लघु कथाएं ,
चित चिंतन और चरित्र ,
अम्मा फ़िर नहीं लौटी
आठ काव्य-संग्रह , दो कहानी-संग्रह , एक उपन्यास ,
तीन व्यंग्य-संग्रह ,
तीन ग़ज़ल-संग्रह ( दो हिंदी में , एक पंजाबी में ) ,
एक — आलेख-संग्रह ,
एक सूक्ति-संग्रह ,
पाँच बाल साहित्य की पुस्तकें ,
एक आलोचना ग्रंथ
दो चालीसा ( बेटी चालीसा व दिव्यांग चालीसा )
सहित विभिन्न विधाओं में 36 पुस्तकें प्रकाशित .
संपादित पुस्तकें :
लघुकथा के छह संकलन और एक ग़ज़ल – संकलन सम्पादन में प्रकाशित ,
मान-सम्मान :
नई दिल्ली में आयोजित सहस्राब्दी विश्व हिंदी सम्मेलन द्वारा ” राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्राब्दी सम्मान — 2000 “
गुजरात हिंदी विद्यापीठ अहमदाबाद द्वारा ” ” हिंदी गरिमा सम्मान — 1994 ” हिंदी साहित्य सम्मेलन , प्रयाग ( इलाहाबाद ) द्वारा ” साहित्य महोपाध्याय सम्मान — 2003 “दलित साहित्य अकादमी द्वारा 1992 में प्रशस्ति पत्र विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर की मानद उपाधि सममान सहित देश की विभिन्न 40 से अधिक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित .
विशेष उल्लेख : विश्व काव्य-संकलन में रचनाएं तथा शताधिक संकलनों में कहानी , लघुकथा , ग़ज़ल , गीत , दोहा , व्यंग्य , साक्षात्कार , बालकथा , बाल-लघुकथा , आलेख आदि प्रकाशित .
गद्य व पद्य के व्यंग्य स्तंभों के नियमित लेखक .
तमिलनाडु बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन के दसवीं कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में लघुकथा
सम्मिलित .
राजकुमार निजात के रचना कर्म पर विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा छह एम.फिल. व छह पी-एच .डी. के शोध कार्य संपन्न व दो अन्य शोध कार्य जारी .
अनुवाद : आलेख-संग्रह ” तू भी हो जा रब ” का डॉ. प्रधुम्न भल्ला द्वारा अंग्रेजी अनुवाद .
संपर्क : मकान नं. 7 , गली नंबर -1 , हरि विष्णु कॉलोनी , कंगनपुर रोड , सिरसा –125055 (हरियाणा ) मोबाइल 94167 -29760 , व्हाट्सएप 90175 – 29760 ई मेल : [email protected]
कोरोना ग़ज़ल
खुलकर कीजे वार कोरोना हारेगा ।
है भारत तैयार कोरोना हारेगा ।।
घर पर रहकर करें इसे कमजोर सभी ।
हो न सके विस्तार कोरोना हारेगा ।।
जीवन का पहिया गर कुछ दिन रोकोगे ।
कड़ी पड़ेगी मार कोरोना हारेगा ।।
जीवन की आपाधापी कुछ दिन खातिर ।
कम कर दो रफ़्तार कोरोना हारेगा ।।
आएँ न संपर्क में इक दूजे के हम ।
होगा बंटाधार कोरोना हारेगा ।।
डरना और डराना नहीं किसी को भी ।
मिलकर हो प्रहार कोरोना हारेगा ।।
शंख-ध्वनि , ताली-थाली , घंटा-घंटी ।
बजेगी बारम्बार कोरोना हारेगा ।।
दूर रहें अनजानी खांसी वालों से ।
कुछ भी नहीं दुश्वार कोरोना हारेगा ।।
नहीं मिलाओ हाथ , हाथ जोड़ो सबको ।
करो दूर से प्यार कोरोना हारेगा ।।
बहुत जरूरी हो तो निकलो बाहर तुम ।
रहो घरों में यार कोरोना हारेगा ।।
है ” निजात ” यह जंग इसे जीतेंगे हम ।
जारी है उपचार कोरोना हारेगा ।।
इक बंजारा गीत लिखूँ
तुम कह दो तो इन आँखों पर
इक कजरारा गीत लिखूँ
तुम कह दो तो इन पलकों पर
न्यारा-न्यारा गीत लिखूँ
तुम चाहो तो इस धड़कन पर
लिख दूँ कोई राग प्रिय
तुम कह दो तो तेरे होठों पर
बंजारा गीत लिखूँ
नदिया के इस निर्जन तट पर
जाने कब से बैठे हो
इन आँखों में ग़र बस जाओ
एक दुलारा गीत लिखूँ
घाटी के इस गहरे जंगल
में सूनी आवाजें हैं
बैठ यहाँ इस सूनेपन पर
इक आवारा गीत लिखूँ
सागर में उठती लहरों का
शोर बुलाता रहता है
इन उतुंग लहरों पर जाकर
वो उजियारा गीत लिखूँ
दूर तलक आवारा तट पर
गूंज रही है गीत ध्वनि
इसी ध्वनि के सुर सागर में
नाद गुंजारा गीत लिखूँ
रात अकेली जाग रही है
तारों के बागीचों में
आसमान के नील अधर पर
प्यारा-प्यारा गीत लिखूँ
ग़ज़ल :- राजकुमार निजात
? लंबी रातें दिल की बातें मैं और तुम । ?
? खत्म ना हो फिर ऐसी रातें मैं और तुम ।। ?
? चेहरे ने चेहरे को छूकर जब देखा । ?
? मिली मोहब्बत की सौगातें मैं और तुम ।। ?
? इस सीने की पीर , बहुत ही गहरी है । ?
? कैसे अपने जख्म दिखाते मैं और तुम ।। ?
? पगला मौसम इश्क़ बावरा क्या जाने । ?
? क्या पागल दिल को समझाते मैं और तुम ।।?
? आसमान से चाँद उतरकर आ बैठा । ?
? कैसे फ़िर वो राज़ छुपाते मैं और तुम ।। ?
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ग़ज़ल :-राजकुमार निजात
उनकी शोहरत उन्हें मुबारक मुझको मेरी गुमनामी ।
झूठ से हासिल नाम से बेहतर सच से हासिल बदनामी ।।
अपनी ही मंजिल की खातिर जिनको प्यारा है चलना ।
उनकी राहें क्या रोकेंगी दुश्वारी और नाकामी ।।
वक़्त से आगे आगे चलना इतना महँगा पड़ता है ।
अगर जानते हम तो रहते जीवन भर ही अनुगामी ।।
चाँद से उजले चेहरे पर भी काला दाग़ तो होता है ।
जब सोचोगे अपनालोगे हर इंसां की हर खामी ।।
वह तो है दरिया सा इंसां है ख़ामोशी से रहता है ।
बेशक उसके हिस्से आए नाम या कोई बेनामी ।।
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मुझे बच्चा समझ अब भी बुलाती है मेरी अम्मा ।
मुझे दुख-दर्द सब अपना सुनाती है मेरी अम्मा ।।
मेरे चेहरे की पेशानी को झट से भाँप लेती है ।
उठूँ जो देर से मुझको जगाती है मेरी अम्मा ।।
न सो पाऊँ तो मुझसे पूछती है हाल वो मेरा ।
सिरहाने बैठकर मुझको सुलाती है मेरी अम्मा ।।
मेरे बच्चे अगर मुझको कभी कुछ डाँट देते हैं ।
उन्हें हल्की सी थपकी से डराती है मेरी अम्मा ।।
बहुत बदला है बेशक इस सदी का ताना-बाना सब ।
ज़माना अपना ही बेहतर बताती है मेरी अम्मा ।।
उसे सब याद है आना ,दवन्नी ,पैसा ,पाई भी ।
वो उन सिक्कों को अब भी आजमाती है मेरी अम्मा ।।
परांठे,हलवा ,पूरी, खीर, डोसा खा ही लेती है ।
मजे से खूब जी भर करके पचाती है मेरी अम्मा ।।
कोई लफड़ा गली में या मोहल्ले में जो हो जाए ।
फिर उसका हल वहाँ जाकर सुझाती है मेरी अम्मा ।।
अगरचे भोली-भाली है मगर सुलझी-सयानी है ।
मुसीबत आने पर दमखम दिखाती है मेरी अम्मा ।।
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खुशबुएँ देकर मुझे वो ज़िंदगानी ले गया ।
मेरे दिल की महक़ सारी जाफ़रानी ले गया ।।
अपने छत की बुर्ज से बस कुछ कबूतर छोड़कर ।
मुट्ठियाँ भर-भर के तारे आसमानी ले गया ।।
फूल कहकर राह में काँटे उगा डाले बहुत ।
और उसके घर की सारी बाग़वानी ले गया ।।
बख़्श डाली जब खताएँ इश्क़ में महबूब ने ।
वो उठाकर इश्क़ की सारी निशानी ले गया ।।
बावरा सा दिल मोहब्बत में बहुत मगरूर था ।
आँख से मस्ती चुराकर दो ज़हानी ले गया ।।
ग़ज़ल:-राजकुमार निजात
चल के खेतों में आ गई है ग़ज़ल ।
हरे पत्तों पे छा गई है ग़ज़ल ।।
ले के सूरज के माथे का चुंबन ।
रोशनी में नहा गई है ग़ज़ल ।।
सिर से पा तक थी वो ग़ज़ल जैसी ।
देख कर उसको भा गई है ग़ज़ल ।।
फूल पत्तों पे आई जब रौनक ।
नाज़ उनके उठा गई है ग़ज़ल ।।
एक कुदरत तमाम है इसमें ।
राज हँस कर बता गई है ग़ज़ल ।।
दिल की है गुनगुनाहटें सारी ।
दिल के किस्से सुना गई है ग़ज़ल ।।
आई जब भी अज़ाँ मुअज़्ज़न की ।
गीत यह दिल के गा गई है ग़ज़ल ।।
रूहानी ग़ज़ल:-राजकुमार निजात
बूँद कभी सहरा हूँ मैं ।
सोच रहा हूँ क्या हूँ मैं ।।
चार घड़ी का मेहमां हूँ ।
बरसों से ठहरा हूँ मैं ।।
मैं टहनी का पत्ता हूँ ।
या जड़ सा गहरा हूँ मैं ।।
तू ग़र मेरी बंदिश है ।
सुर से ख़ूब भरा हूँ मैं ।।
तेरे घर में रहता हूँ ।
तेरा एक पता हूँ मैं ।।
आज हूँ मैं कल भी था ।
कल का एक सिरा हूँ मैं ।।
एक बुलबुला पानी का ।
या कोई कतरा हूँ मैं ।।
मैं ही तेरी मंजिल हूँ ।
तेरा ही रस्ता हूँ मैं ।।
ढूँढ मुझे मिल जाऊँगा ।
भीतर ही रहता हूँ मैं ।।
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ग़ज़ल:-राजकुमार निजात
मैं माटी का पुतला बनकर ख़ुद को नाच नचाता हूँ ।
तुमको इस झूठी दुनिया की सच्ची बात बताता हूँ ।।
इस जीवन की दुनियादारी मटमैली न हो जाए ।
इसीलिए भीतर का कचरा जब-तब साफ़ कराता हूँ ।।
लेकर घर का ताना-बाना वे पैदल ही दौड़ पड़े ।
उन बेबस और लाचारों की तुमको कथा सुनाता हूँ ।।
जाने कैसे लोग खड़े हैं बाज़ारों की ड्योढ़ी पर ।
बाहर की दुनियादारी से मैं अक्सर घबराता हूँ ।।
जिन लोगों की सूनी आँखों में डर का सन्नाटा है ।
उन आँखों की पीड़ा पढ़कर मैं सचमुच डर जाता हूँ ।।
नई सदी के मंदिर ,मस्जिद सारे पीछे छूट गए ।
जिनसे पढ़ना था मुझको मैं उनको पाठ पढ़ाता हूँ ।।
जंगल के शेरों-घड़ियालों से अब वैसा ख़ौफ़ नहीं ।
फुर्सत में इन जाँबाज़ों से अपना मन बहलाता हूँ ।।
ग़ज़ल :-राजकुमार निजात
( 1 )
फ़िर दरवाजे खोल दिए हैं अब आज़ाद है मधुशाला ।
पीने वालों को आने दो फिर आबाद है मधुशाला ।।
पीने और पिलाने वाला कौन यहाँ था याद नहीं ।
इन बातों को लेकर हरदम निर्विवाद है मधुशाला ।।
एक हाथ से शेख उठाता प्याला दूजे पंडित जी ।
साक़ी के हाथों को इतना कहाँ याद है मधुशाला ।।
प्याला भर कर उसने अपने इष्ट देव को याद किया ।
बोला शेख तुनक कर क़ौसर की ईजाद है मधुशाला ।।
मेरा प्याला मेरी प्याली कहकर सारे गटक गए ।
खड़ी देखती रही रात भर एक नाद है मधुशाला ।।
इसकी छत के नीचे अल्लाह है तो ईश्वर भी होगा ।
दोनों ही हैं एक तो फ़िर कैसे फसाद है मधुशाला ।।
तेरा प्याला मुझको दे दे मैं तेरा प्याला ले लूँ ।
दो हैं प्याले एक है मदिरा एक दाद है मधुशाला ।।
( 2 )
सबके प्याले भर देता है हाथ बढ़ा करके साक़ी ।
कहने को तू कुछ भी कह दे यही शाद है मधुशाला ।।
रोज़ पिलाना मुझको साक़ी मैं अब हर दिन जाऊँगा ।
भूल गया हूँ मैं अब सब कुछ फ़कत याद है मधुशाला ।।
साक़ी एक प्याला देकर भूल न जाना मयकश को ।
पीने वालों की खातिर यह एक दाद है मधुशाला ।।
पीने वाला मंदिर-मस्जिद छोड़ यहाँ पर आता है ।
सबकी खातिर सबकी प्यारी इक मुराद है मधुशाला ।।
देर रात तक नई सुबह तक चले गए पीने वाले ।
बिना थके बैठी है फ़िर भी बेमियाद है मधुशाला ।।
दीवाना होता है मयकश केवल मय की मस्ती का ।
साक़ी के हाथों का प्याला ब्रह्मनाद है मधुशाला ।।
साक़ी भूल न जाना मुझको मुझसे एक ये वादा कर ।
सब कुछ भूल गया हूँ केवल यही याद है मधुशाला ।।
( 3 )
पीने वाला जितनी चाहे उतनी मिलती मयकश को ।
इसीलिए तो हर कूचे में ज़िंदाबाद है मधुशाला ।।
जो भी आता थिरक-थिरक कर जाता है मधुशाला से ।
सबको मस्त मलंग बना दे वो आह्लाद है मधुशाला ।।
एक प्याला भर दे तो दूजा खाली हो जाता है ।
घूँट-घूँट भर पीने वाले की मुराद है मधुशाला ।।
मैंने हाथ बढ़ाया लेकिन उसके हाथ लगा प्याला ।
फ़िर भी मन ने मान लिया कि बास्वाद है मधुशाला ।।
साक़ी मेरे प्याले में भर दे सबसे ज्यादा मस्ती ।
बार-बार मन यही कहे सबकी मुराद है मधुशाला ।।
साक़ी ने हर बूंद-बूंद से रजा दिया सबको इतना ।
पीने वाले अब कहते हैं इक प्रसाद है मधुशाला ।।
इतनी मस्ती और कहाँ मिलती है ये बतला मयकश ।
इसीलिए सदियों से ज़ारी ये आबाद है मधुशाला ।।
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ग़ज़ल:- राजकुमार निजात
दिल से ही ग़र बात न निकले प्यार जताना बेमानी ।
वो आए तेरे घर तेरा उसके जाना बेमानी ।।
जिन रिश्तों में अपनेपन का कोई भी एहसास न हो ।
ऐसे रिश्ते – नातों का फ़िर बोझ उठाना बेमानी ।।
आँखों से एक रंग उतर कर गालों तक भी न पहुँचे ।
ऐसे में फिर उसको तेरा रंग लगाना बेमानी ।।
ख़ुश्बू,तितली,धड़कन,बुलबुल,मौसम,फूल,हरे-पत्ते ।
मिल जाएँ ग़र ये तो उसका मंदिर जाना बेमानी ।।
मैं ही छलकूँ महफ़िल में उसका दिल भी लबरेज़ मिले ।
बार-बार मेरा ही पैमाना छलकाना बेमानी ।।
ग़ज़ल , कविता बेशक़ दिल से कह दी हो तूने लेकिन ।
उस तक पहुँच न पाई तो फिर ग़ज़ल सुनाना बेमानी ।।
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ग़ज़ल:- राजकुमार निजात
उसका मन गुलशन-गुलशन है उसका चेहरा फूलों सा ।
उसकी आँखों में जीवन है उसका चेहरा फूलों सा ।।
उसके भीतर कई बहारें उसके भीतर सूरज है ।
उसके चेहरे पर बचपन है उसका चेहरा फूलों सा ।।
वह रातों में जुगनू बनकर टिम-.टिम करता रहता है ।
तारों सा उसका दामन है उसका चेहरा फूलों सा ।।
अपनी आँखों से वह अपना रूप बदलता रहता है ।
उसका चेहरे पर चिलमन है उसका चेहरा फूलों सा ।।
उसके भीतर कितने मौसम सावन बनकर आते हैं ।
खिला हुआ सा उसका मन है उसका चेहरा फूलों सा ।।
महक भरा इक मौसम उसके हरदम साथ विचरता है ।
चंदन सी उसकी चितवन है उसका चेहरा फूलों सा ।।
लघुकथा :-” खाली सकोरा ” राजकुमार निजात
पार्क में वृक्ष की टहनी पर टंगे सकोरे पर चिड़िया आकर बैठती और उड़ जाती । कुछ देर बाद वह फिर आती और थोड़ी देर बैठकर चूँ- चूँ करती फिर उड़ जाती । ऐसा तीन- चार बार होता देखकर निरंजन की नजर उस पर पड़ी ।
वह कुछ देर खड़ा उस दृश्य को देखता रहा । तभी उसने वृक्ष पर चढ़कर देखा कि सकोरा तो खाली था । न जाने कब से उस सकोरे में पानी नहीं डाला गया था ?
वह तुरंत पार्क में लगे एक नल पर गया । वहाँ रखा पात्र पानी से भरा और लाकर उस सकोरे में उड़ेल दिया और वापस वह पात्र उसी स्थान पर रखने के लिए चला गया ।
जब वह लौटकर आया तो देखा उस सकोरे पर एक नहीं कई चिड़ियाँ बैठी थी । चिड़ियों की चूँ-चहाहट बतला रही थी कि इस तपती गर्मी में शायद वहाँ किसी भी सकोरे में पानी नहीं था ।
लोगों ने पुण्य की दृष्टि से दिखावे के तौर पर पानी के सकोरे तो जगह-जगह पर टांग कर रख दिए थे लेकिन उनमें पानी की व्यवस्था करना वे भूल गए थे ?
निरंजन ने एक-एक करके वहाँ रखे सभी खाली सकोरे पानी से भर दिए ।
देखते ही देखते पंछियों की चूँ – चूँ से वह पार्क अब खिलखिला रहा था । चिड़ियों को पानी पीते देखकर उसे भी प्यास लग आई थी ।
उसे लगा वह भी इन चिड़ियों में से कोई एक चिड़िया है ।
गीत :-राजकुमार निजात
हम फूलों के घर में रहकर
फूलों का श्रृंगार करेंगे
फूलों जैसे बन जाएंगे
फूलों सा व्यवहार करेंगे
फूलों की नगरी में आकर
फूलों सा संवाद करेंगे
हर पत्ते को प्यार बांटकर
फूलों का अनुवाद करेंगे
तुम भी फूलों जैसा बनना
हम भी फूलों जैसे होंगे
फूलों के संग चलकर सारे
फूलों से मनुहार करेंगे
घर-घर फूल बाँटने वाले
घर-घर फूल बिखेरेंगे जब
घर के छत-चौबारे सारे
फूलों की झंकार करेंगे
फूलों में जो रहते निश-दिन
फूलों के सपने लेते हैं
पुष्पित मंगल गान संजोकर
फूलों की बौछार करेंगे
फूलों की घाटी में चलकर
फूलों का इक शहर बसाएँ
हम मिलकर के सारे इक दिन
फूलों की रसधार करेंगे
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व्यंग्य – ग़ज़ल :-राजकुमार निजात
मिले जहाँ भी जगह वहाँ तू फिट हो जा ।
रंग बदल हर बार अरे गिरगिट हो जा ।।
पदमश्री इक रोज़ तुझे ऑफर होगी ।
जैसे भी हो एक बार तू हिट हो जा ।।
आँख मीच कर चौके-छक्के मारा कर ।
खेल-खेल कर इसी तरह किरकिट हो जा ।।
मिले जो मौका कूद चुनावी दंगल में ।
जीत-हार मत देख और अमिट हो जा ।।
छोटी-मोटी एक सटीपणी बन जा तू ।
मौका पाकर कहीं किसी की किट हो जा ।
पर्ची बनकर देख करोड़ों की यारब ।
काम बने सरपट तू ऐसी चिट हो जा ।।
खूब चलेगा तेरा सिक्का करके देख ।
एक अंगूठा छाप कोई परमिट हो जा ।।
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इस वक्त को गुजर जाने दो
वक़्त सर पे बैठा है
मौत का सिरहाना लेकर
जिंदगी डगमगा रही है
रास्ते सुनसान हैं
गलियाँ चुप हैं
लोग ख़ामोश हैं
वक़्त मुश्किल भरा है
वक़्त आवाज नहीं देता
बस चुपके से आ जाता है
हमारी जिंदगी के दरवाजे पर
ताकता है हमारे चेहरे को
और सुनता है दिल की धड़कनें
वक़्त खौफ़नाक है
वक़्त चिंताजनक है
लेकिन आदमी बहादुर होता है
हौसला उसकी ताकत है
जिंदगी सबसे बड़ी मुश्किल के
मुहाने पर खड़ी है
सब आने वाले कल की इंतजार में हैं
लेकिन यह कठिन दौर
यह बुरा वक़्त
बेहद खतरनाक वक़्त
एक दिन जरूर गुजर जाएगा
क्योंकि हर वक्त को
गुज़र जाना होता है
नए वक़्त को आना होता है
नया वक़्त आएगा
नया संदेश लाएगा
जिंदगी के नए नग्मे गूंजेंगे
और हम एक बार फिर
जिंदगी के चौराहे पर
एक दूसरे से
मोहब्बत भरी निगाह से देखेंगे
और सच्चे दिलों से फिर मिलेंगे
इस वक़्त को जाने दो
नए वक़्त को आने दो
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