उतना ही प्रसन्न है ,
जितनी वह नदिया
अपनी कल कल में ,
मुखरता और मौन का
संवाद हुआ जब ,
तो आसमान से उतरी
तृप्ति की बूंदे ,
भीगा नदिया का भी तट
और प्रक्षालित हुए कदम पहाड़ के भी ,
नदी अंजुरी भर पी गई
चुप्पी थोड़ी पहाड़ की
और नदिया की कलकल करती
पायल का घुंघरू,
पहाड़ ने छुपा लिया मुट्ठी में..।
यू बँट गए कुछ अंश
और फलित हुई आसक्ति….।
अब पहाड़ ..कभी-कभार
लगाता है कहकहे
और नदिया
रात के किसी पल
ओढ़ती है खामोशी
ठहराव की चाह में ।
मगर…..,
पहाड़ हमेशा पहाड़ ही रहा
और नदिया नदिया ही ।
ममता आहुजा “मीत”
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क्या कहूं बेटियों के लिए,
कि क्या होती हैं बेटियाँ,
या कहूं ,
कि क्या नहीं होती हैं बेटियां,
विधाता की सबसे अनुपम रचना है बेटियाँ,
किसी किताब का पहला और अंतिम पन्ना है बेटियाँ,
भौर में देखा सुनहरा सपना है बेटियाँ।
सावन की मदमाती बारिश सी बेटियाँ,
सर्दी की धूप की तपिश सी बेटियाँ,
जेठ की शीतल पवन सी बेटियाँ,
होली के रंग और रागिनी सी बेटियाँ,
दीवाली के दीपों की यामिनी सी बेटियाँ,
पूनम के चाँद की चांदनी सी बेटियाँ,
अमावस्या की रात की सहर सी बेटियाँ,
थकान मिटा सुकूँ देती दोपहर सी बेटियाँ,
किसी गज़ल की अंतिम बहर सी बेटीयाँ।
राधा के मान सी बेटियाँ,
सीता के स्वाभिमान सी बेटियाँ,
सती के अभिमान सी बेटियाँ,
शिशिर के दुशाले सी बेटियाँ,
सावन के शिवाले सी बेटियाँ,
ग्रीष्म में अमृत के प्याले सी बेटियाँ।
मन्दिर के वेद और पुराण सी बेटियाँ
मस्जिद की नमाज और कुराण सी बेटियाँ,
गुरुद्वारे के प्रसाद सिमरन और गान सी बेटियाँ,
सूरज की जगमगाहट सी बेटियाँ,
तारों की टिमटिमाहट सी बेटियाँ,
चाँद की नरमाहट सी बेटियाँ।
धरती के धीर सी बेटियाँ,
बादल के नीर सी बेटियाँ,
सागर की पीर सी बेटियाँ।
पुष्प की महक सी बेटियाँ,
पंछी की चहक सी बेटियाँ,
चूड़ी पायल की खनक सी बेटियाँ।
क्या कहूँ बेटियों के लिए,
हर उपमा मुझे अधूरी लगती है,
हर शब्द हर भाव हर अलंकार से परे,
जीवन की हर कसौटी पर ये बेटियाँ,
स्वर्ण और कुंदन सी खरी लगती हैं।
कर्म में प्रवीण रिद्धि सिद्धि हैं बेटियाँ,
आरती,अजान और पूजा की विधि हैं बेटियाँ,
विधाता की अनुपम निधि हैं बेटियाँ।
विधाता की अनुपम निधि हैं बेटियाँ।
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यूँ तो बहुत भीड़ है शहर भर में,
ईंट और पत्थरों से बने मकानों की,
पर बना हो प्रेम और अपनेपन के धागों से,
जहां में अब ऐसे घर नहीं मिलते,
सर झुके यूँ ज्यों मन्दिर की दहलीज हो,
घरों में अब वो दर नहीं मिलते।
यूँ तो हर रिश्ते के वही हैं नाम सदियों पुराने,
बस परिभाषाऐं बदल गई हैं,
भरे हों जो अर्पण और समर्पण के भावों से,
जहां में अब ऐसे जिगर-ए-जफर(जीतने वाला)नहीं मिलते,
महक जाए जिनकी खुशबु से मन के गलियारे,
बागों में अब वो आब-ओ-शज़र नहीं मिलते।
यूँ तो दुनिया भर की सारी खबर रहती है इंसां को,
सोशल मीडिया ने सरहदों के फ़ासले मिटा दिये,
पर पहुंच पाए जो पास बैठे किसी अपने के मन तक ,
जहां में अब ऐसे रहगुज़र नहीं मिलते,
बेफिक्र हो जाएं दुनिया से जिनके दिल-ए-आशियाँ में,
मोहब्बत में अब वो जुनूँ-ओ-जिगर नहीं मिलते।
यूँ तो रोशनी है हर तरफ, जगमगाता है शहर,
रात के अंधेरों में भी टिमटिमाता है शहर,
पर दिल की शुष्क क्यारी की हर “कली” खिल उठे,
जुगनुओं की बस्ती में अब ऐसे दिवाकर नही मिलते,
मिट जाए जिसके उजाले से मन की सारी तीरगी,
दुनिया में अब ऐसे मुन्नवर नही मिलते।
बीना जेसानी”कली“
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“दर्द को छुपाना“*
हे राम! कितना मुश्किल होता है, दर्द को छुपाना।।
आहें भी भरना, सिसकियाँ भी लेना।
उन सिसकियों को, हिचकियों में ढालना।।
हाय! कितना मुश्किल………..
छुप-छुपकर रोना, आँखों का लाल होना।
आँखों की लाली से तब, कचरे को झटकाना।।
उफ़! कितना मुश्किल………..
किसी से बात न करना, बात करना तो अटकना।
अटकन को तुरंत, गले की खराश में बदलना।।
अरे! कितना मुश्किल………..
झूठा ही हँसना, हँसने में रोना।
निकलते आँसुओं को, खुशी का नाम देना।।
सचमुच! कितना मुश्किल………..
रात-भर सोना, आँखों में नींद का ना होना।
सन्नाटे में सुबकने को, साँसों की आहट में बदलना।।
मत पूछो! कितना मुश्किल………..
कभी ईश्वर को पूजना, कभी उसके वजूद को भी झुठलाना।
साथ खड़ा न दिखे कोई, तो फिर से उसमें आस जगाना।।
हे कृष्ण! कितना मुश्किल………..
हे भगवान! कितना मुश्किल होता है दर्द को छुपाना।।
हर्ष भारती नागपाल
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मै आजादी,
वैसे तो हिन्दुस्तान में आए,
कई अरसे हुए मुझे,
मगर समाज ने बाँट रखा है मुझे,
अपने-अपने दायरों में,
किसी के लिए मेरे मायने,
घर की चारदीवारी में दफन हो जाते हैं।
और कई हैं,
जो अपने ख्वाबों तक,
मेरे जरिए जाना चाहते हैं।
मै उनकी खुशियाँ बनकर,
आना चाहती हूँ अब इस देश में,
जिनके सामने मुझ तक पहुँचने से पहले,
अभी कई मजहबी दीवारें खडी़ हैं।
अब धर्म के नाम पर,
बाँट रखा है मुझे जिसने,
कभी उसी भारत की जनता,
मेरे लिए एक साथ लडी़ है।
आना चाहती हूँ मै इस बार कुछ अलग वेश में,
एक नया उजियारा दिखे इस वर्ष मेरे देश में,
मै गीता और कुराण दोनों पढना चाहती हूँ,
पुरुष-नारी में मै नहीं कोई सामाजिक भेद चाहती हूँ।
मैने एक हिन्दू के साथ मस्जिद,
और मुस्लिम के साथ मंदिर का ख्वाब देखा है।
मिट जाए बस वो हर एक लकीर,
जिसे कुछ कहते हैं धार्मिक तो कुछ,
जातिगत रेखा है।
आने वाले हर साल मै अपना हर दिन,
हर धर्म के साथ मनाना चाहती हूँ।
धर्म-जाति के इस भेद से काफी परे,
मै हर जश्न में पूरा हिन्दुस्तान चाहती हूँ।
–निष्ठा गुप्ता



Meenakshi Ahuja
May 29, 2020 at 6:07 am
बहुत अच्छी रचनाएँ। ममता, हर्ष, निष्ठा और बीना जी को साधुवाद?
Meenakshi Ahuja
May 29, 2020 at 6:07 am
बहुत अच्छी रचनाएँ। ममता, हर्ष, निष्ठा और बीना जी को साधुवाद?