(Ghazalkaar, Geetkaar, Story & Script Writer, Manch Sanchaalak, Editor aur Publisher)
Published Books – 67
Hindi – 43 (Latest – Sagar Ki Gehrai Se-Ghazal Sangreh)
Punjabi – 24 (Latest – Patjhad Da Phull Kavya Sangreh)
Publishing Books as Editor – 5
Translated Book- 1
Acting in Hindi and Punjabi Films
Founder and Editor – Hindi Quarterly Magazine :-
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यूँ कहने को तो पहुँचा है ये इन्सां आस्मानों में
मगर इंसानियत बिकते हुए देखी दुकानों में
नहीं किरदार अब बाकी यहाँ के हुक्मरानों में
ज़मीं तो खा चुके नज़रें गड़ी हैं आस्मानों में
हमारे सर पे होगा शामियाना गर बज़ुर्गों का
रहेगी हर ख़ुशी फिर देखना अपने मकानों में
मुलम्मा झूठ का ग़ज़लों पे मेरी चढ़ नहीं सकता
हक़ीक़त आएगी तुमको नज़र मेरे तरानों में
ग़रीबी, बेबसी, मजबूरियों की तोड़ कर बेड़ी
मैं अपना नाम लिक्खूँगा किसी दिन आसमानों में
कोई उर्दू का दीवाना, कहीं तारीफ़ हिन्दी की
दिलों की बात कर, रक्खा नहीं कुछ भी ज़ुबानों में
कोई जब भी पढ़ेगा तो लगेगा बस उसे अपना
यूँ मैंने लिख दिया हर दर्द अपना इन फ़सानों में
हैं दिल के बादशाह हम भी दिलों पर राज़ करते हैं
हमारा दिल नहीं लगता इन ईंटों के मकानों में
लुटा देते हैं जाँ अपनी वतन के वास्ते ‘सागर’
ये जज़्बा है हमारे देश के बाँके जवानों मे
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मैं जब चाहूँ जहाँ चाहूँ बना लूँ आशियाँ अपना
है हर इक शाख़े गुल अपनी है सारा गुलसिताँ अपना
मेरी परवाज़ को वो दम दिया है देने वाले ने
ज़मीं ही क्या नज़र आता है मुझको आस्मां अपना
जो करना है वो तुम कर लो ज़ुबाने काटने वालो
न बदला है न बदलेगा ये अंदाज़े बयाँ अपना
यहाँ के बाद भी इक ज़िन्दगी और पेश आएगी
सफ़र है ज़िन्दगी अपनी ठिकाना है कहाँ अपना
भरोसा है मुझे ख़ुद पर ख़ुदी पर नाज़ है ‘सागर’
कि मंज़िल पा ही लेगा जब चलेगा कारवाँ अपना
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कहीं नदियाँ, कहीं गुलशन, कहीं पर्वत ज़माने में
है हर इक रंग कुदरत का ख़ुदा के शामियाने में
ज़रा सोचो वो क्या सोचेगा अपने देश की ख़ातिर
हर इक पल जिसका कटता है यहाँ रोटी जुटाने में
ये कैसा दौर है इन्सानियत गुम है मेरे मालिक
मज़ा आता है लोगों को किसी का दिल दुखाने में
ज़माने का नहीं है दोष कोई गर जुदा हैं हम
कमी हम में रही होगी मुहब्बत को निभाने में
उसे बेटे ने इक पल में यहाँ बर्बाद कर डाला
गुज़ारी बाप ने इक उम्र जो इज़्ज़त कमाने में
वहाँ ग़म का कोई साया नहीं पड़ता कभी ‘सागर’
बुज़ुर्गों की है इज़्ज़त दोस्तो जिस आशियाने में
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मुश्किलों से न दामन बचाया करो
राह अपने लिए ख़ुद बनाया करो
इस तरह तो ये बच्चे बिगड़ जायेंगे
हर खिलौना न इनको दिलाया करो
सिर्फ़ बहरों से ग़ज़लों को मत तोलिए
बात दिल की है दिल से सुनाया करो
सरहदों को भुलाकर ज़माने की तुम
पंछियों की तरह आया जाया करो
अपने बच्चों को मैंने सिखाया यही
तुम बज़ुर्गों से आशीष पाया करो
रेत पर रेत लिखना बड़ी बात क्या
लिख के पानी पे पानी दिखाया करो
प्यार बेटों से अपने करो तुम मगर
बेटियों को भी सीने लगाया करो
बन न पाओ जो सूरज कोई ग़म नहीं
बन के दीपक अँधेरा मिटाया करो
कल की हैं रौशनी देश की शान हैं
कोख़ में ही न इनको बुझाया करो
अपने बच्चों की थोड़ी ख़ुशी के लिए
जीत कर भी कभी हार जाया करो
गर न तुमको मिलें मंज़िलें दोस्तो
रास्तों को ही मंज़िल बनाया करो
नाम “सागर” है मन के भी सागर बनो
ख़ुद को सागर सा गहरा बनाया करो
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भरी महफ़िल में तन्हाई मुझे पहचान लेती है
जिसे मैं जान कहता हूँ वो मेरी जान लेती है
कहूँ कैसे बुरा इसको है प्यारी ज़िन्दगी इतनी
जो कहता हूँ कि ग़म दे दे ये मेरी मान लेती है
छुपाना लाख मैं चाहूँ करूँ कितनी भले कोशिश
न जाने माँ मेरी कैसे वो बातें जान लेती है
कभी कमज़ोर हो मैंने जो चाहा हाथ फैलाऊँ
ये ख़ुद्दारी मेरी उस पल ही सीना तान लेती है
बहुत रोती हैं ये आँखें तड़प उठता है दिल ‘सागर’
किसी का ज़िन्दगी मेरी ये जब एहसान लेती है
‘सागर’ सूद
संस्थापक एवं संपादक
साहित्य कलश
पत्रिका एवं पब्लिकेशन


