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लघु कविताएं

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इन दिनों

रास्ते कहीं नहीं जाते
बाग बगीचों से
बच्चों की खिलखिलाहटें
गायब हैं
सड़कों और पार्कों में
खड़े बुत
बतिया रहे हैं
पंछियों के संग
बीते ज़माने की बातें
तेजी से फैलती
मौत की खबर से
उनके पथरीले माथे पर
उभर आई हैं
चिंता की रेखाएं
सड़कों पर पसरा मौन
उन्हें बता रहा है
कि मनुष्य के पास
नहीं बचा है अब
एक भी उपाय
मौत को स्थगित करने का
आरती बंसल (सिरसा)
—————————————-
 विश्वास
न होगी बंद
ढोलक की थाप
और मंगल-गीत भी
बने रहेंगे लोक-गीत
पैरों की पायजेब की छनछन और
हाथों के कंगन की मधुर ध्वनियाँ 
रखेंगी घर-आँगन को मधुरिम
बिंदिया भी सजती रहेगी
दमकते भाल पर हमेशा
भाई की शादी के बन्ने भी
गाएँगीं बहनें 
और जीजी के ब्याह के
सुहाग भी तो
लड़कियाँ ही गाएँगी 
ज़िंदा रहेंगे रिश्ते
प्यार और अपनापन लिए
होगी लम्बी उम्र
संस्कारों की 
गर्भ में होंगीं 
पुष्पित ,पल्लवित,हर्षित
  कन्याएँ 
…..क्योंकि अब
    नहीं होगी मजबूर 
     माँ 
किसी के भी हाथों 
भ्रूण -परीक्षण व भ्रूण गिरवाने 
 के लिए
अब माँ ही रखेगी सुरक्षित
अपनी लाडो को
क्योंकि  
जान लिया है सबने
प्रकृति 
कहाँ करती है बर्दाश्त 
ख़लल 
अपनी सत्ता में
क्योंकि जब-जब भी
की गई है क़ुदरत के
अस्तित्व से
  छेड़छाड़ 
तब-तब ही हुआ है
  महाविनाश …..
शमिन्द्र कौर
H.N. 24, 3rd ब्लॉक
वार्ड नं. 16
पुरानी आबादी- श्रीगंगानगर
पिन-335001
—————————————-
 *बचपन
बचपन 
तुम उस खोई अठन्नी से हो 
अगर मिल भी जाओ 
तो शायद 
खर्च न कर पाऊं 
क्योंकि 
जिंदगी का बाजार
 बहुत महंगा हो गया है 
बचपन की अठन्नियों का 
अब कुछ मिलता ही नहीं
 और 
अगर कुछ लेना भी चाहूं 
तो वह कभी नहीं मिलेगा 
जो 
उस एक अठन्नी में मिल जाता था 
जिस पर दिल खिल जाता था 
पूरी तनख़्वाह खर्च करके भी 
उम्र की पूंजी गंवा बैठे हैं 
जब से बचपन की अठन्नी 
राह में लुटा बैठे हैं।
©मीनाक्षी आहुजा
—————————————-
एक नज्म…
बेच दी मजबूरियां जब, बाजार बन गया 
आंसुओं की बोली लगी ..अखबार बन गया
 होश में भी जब मिली बेहिसाब जिल्लतें
 झूठा सच्चा सा मेरा ..किरदार बन गया
 तोड़ डाली किश्तियाँ ,उस मनचले तूफान ने 
साहिल का वाशिंदा देख ..मझदार बन गया 
कौन जाने कब दिखी थी परियां हमें ख्वाब में
 दिल आज फिर से नींद का.. तलबगार बन गया 
सुकून की बलि चढ़ी ,दिल ये मक़तल जब बना 
पीर की किरची चुभी ..अशआर बन गया
                 ममता आहुजा “मीत”
—————————————-
खामोश रहकर जो बहुत कुछ बोल जाती है
यह ईश्वर की वो कृति है जो मौन से दुनिया जीत जाती है
अश्क आँखों में भरकर सारे दुख भूल जाती है
छिपा के अपने ग़मों खुशियां बाँट जाती है
यह ईश्वर की वो कृति है जो मौन से दुनिया जीत जाती है
बिना अस्त्र के ही सारी जंग लड़ के
 आती है
हाथ बाँध कर ही रण में अकेले जीत जाती है
यह ईश्वर की वो कृति है जो मौन से दुनिया जीत जाती है
अपने आत्मविश्वास से कभी-कभी डोल जाती है
समेट कर अपनी हिम्मत सबका विश्वास जगा जाती है
यह ईश्वर की वो कृति है जो मौन से दुनिया जीत जाती है
अपने लिए नहीं अपनों के लिए जिंदगी जी जाती है
ख्वाहिशें अपनी छिपा कर कहीं दफना सी जाती हैं
यह ईश्वर की वो कृति है जो मौन से दुनिया जीत जाती है
कभी माँ कभी बहन कभी बेटी बनकर जानी जाती है
और कभी माँ की कोख में ही सिमट कर रह जाती है
यह ईश्वर की वो कृति है जो मौन से दुनिया जीत जाती है           ©सुषमा गुप्ता
—————————————-
है
चिंता
बेचैनी
मिले काम
मेहनताना
अधूरी ख़्वाहिशें
बिलखते बच्चे
हरीश सेठी ‘झिलमिल’
                 सिरसा
—————————————-
 *वर्तमान परिस्थितियों को समर्पित दोहे*
लॉक हुई इस अवधि में, बदल गया है वेश।
छुटी है दुनियादारी, प्रभु चरण ही शेष।।
जग में सबकी एक-सी, लौकिकता की पीड़।
कर्म रहेंगे साथ में, नहीं रहेगी भीड़।।
तेरी अपनी बात है, मेरी अपनी व्यथा।
वैसा ही फल है मिले, जैसी जिसकी कथा।।
जाना होगा एक दिन, प्रभू चरण समकक्ष।
जप ले माला नाम की, दूसरा नहीं पक्ष।।
हर्ष भारती नागपाल 
—————————————-
घर के किसी कोने में सिमटा सा
कालीनों के नीचे दुबका सा
शानदार सोफों के पायों के नीचे
दम तोड़ता
मेरा बचपन कहीं खो गया है।
डा चारू कालरा
व्याख्याता, वनस्पति विभाग
दीन दयाल उपाध्याय महाविद्धालय
दिल्ली विश्व विद्धालय

कवयित्री के नाते
विभिन्न मंचो पर काव्यपाठ

‘शब्दकोश के आँसू’ काव्यसंग्रह प्रकाशित

दिल्ली सरकार द्वारा वर्ष 2017 के श्रेष्ठ व्याख्याता के पुरूस्कार से सम्मानित।
—————————————-
लघु कविता
   … “किताब“…
मैं किताब हूँ रंग-बिरंगी
बनी हृदय भावों से
लिख डाला मुझे किसी ने
खुशी-खुशी से
लिखा किसी ने हृदय घावों से।
बहती हूँ मैं
भाव उद्गगार में
कोई हँसता है तो
हँस लेती हूँ
कोई रोता है तो
रो लेती हूँ।
✍️अनुज
राकेशकुमार जैनबन्धु
ग्राम-रिसालिया खेड़ा,सिरसा
—————————————-
 “ हमें नहीं डरना है “
*ज्ञानप्रकाश पीयूष
फैला है कोरोना 
बेमौत मर रहे हैं लोग
इस पर मत सोच 
हो मत दुखी।
सोच,
हमें क्या करना है 
कैसे हमें जीना है ,
इस संकटकाल की घड़ी में ।
हौसला नहीं खोना है ,
मदद पीड़ितों की करनी है।
शिशुओं को दूध,
भोजन-पानी भूखे प्यासों को
व्यवस्था समुचित ।करनी है ।
अंधों की लाठी बननी है।
हाथ धोना साबुन-सेनेटाइजर से,
निश्चित दूरी बनाए रखनी है
घर में अपने रहना है
बाहर नहीं निकलना है
निकलें तो मुँह पर मास्क लगा कर
ये बात सबको बतानी हैं 
ये बात सबको समझनी है 
दिनचर्या ऐसी बनानी है।
जीना-मरना साथ कोरोना के 
नहीं हमें डरना हैं
 बिल्कुल नहीं डरना है।
                  *
ज्ञानप्रकाश ‘पीयूष’ आर.ई.एस.
पूर्व प्रिंसिपल,
1/258 मस्जिदवाली गली
तेलियान मोहल्ला, 
सदर बाजार के समीप,सिरसा (हरि.)
पिनकोड-125055.
मो. 94145 -37902  ,70155-43276
ईमेल[email protected]
—————————————-
मैं लिख रहा था
कविता
कि 
किसी ने उस पर
हाथ मारा
देखा तो 
छोटी मुनिया
सामने खड़ी थी
हैरान था मैं,
कविता 
कैसे सजीव हो उठी
     -प्रो.रूपदेवगुण (सिरसा)
—————————————-
दुःख जोड़ता है
मिली खुशियाँ
आदमी भूला
औक़ात अपनी
दुःख ने पटका
उसे धरातल पर
तो याद आई
अपनों के कंधों की
सुख तोड़ता है
दुःख जोड़ता है
        -दिलबाग विर्क(मसीतां)
—————————————-
 
हे कवि! तुम लिखो
 मेरे हृदय की अंतरतम प्यास 
जीवन भर ओढ़ी लाचारी 
मेरे थके पैरों की भाषा 
चेहरे की निराशा 
दिखा सको तो दिखाओ
 मेरी आंखों में बसा 
घर लौटने का सपना 
सब लिख चुको तो
 एक उम्मीद का दिया 
एक दुआ सलामती से
 मेरे घर लौटने के लिए भी करना।
         –डॉ.शील कौशिक(सिरसा)
 
————————————–
*पेट की आग*
तप रहा है 
सूरज बहुत 
आग रही 
है बरस 
जला रहा 
सब कुछ 
नहीं करता 
कोई तरस 
पशु-पक्षी भी 
दुबके पड़े हैं 
किसी न किसी 
छांव में 
गली नुक्कड़ 
सुन्न हैं सब 
जैसे रहता ही 
न हो कोई 
गांव में 
मुंह  सिर 
गमछे से लपेटे 
वो चला रहा 
कुदाल है 
अपने आप से 
बातें करता 
विचारों का बुन रहा 
जाल है 
सोचता है कभी 
सब कुछ छोड़ 
जाऊं भाग …
पर नहीं ……..
जानता है वो “कायत” 
ये आग तो कुछ नहीं 
सबसे बड़ी होती है 
पेट की आग…..
*कृष्ण कायत*
—————————————-
 गांव की जमीन
पुरखों की जमीन बेचकर गांवों से 
      यू ना जाया करो….
   कब छोड़ना पड़े यह शहर
गांवों में एक घर भी बनाया करो…..
        कि जिस शहर को
सुविधाओं का अंबार कहते हो
   हवा-पानी सब कुछ मे तो,
प्रदूषण के जहर का अंबार होता है ।
     तुम तो कृत्रिम बने गार्डन को
प्रकृति का सुंदर नजारा कहते हो,
  खेत-खलियान, नदी-नाला, तालाब
महकती हवा के झोंको को क्या नाम देते हो ।
   चलो ठीक है,आधुनिकता की रौनक ने तुम्हें आकर्षित किया है…..
      शहरों की ऊंची इमारतों ने
तुम्हें ऊंचा होने का अहसास दिया है….. 
         चलो ठीक है……..
जीवन की ऊंचाइयों में सारी सफलताएं पाया करो …….
पर……..
     पुरखों की जमीन बेचकर गांव से
    यूं ना जाया करो…….
कब छोड़ना पड़े शहर
गांव में एक घर भी बनाया करो ।
श्रीमती कीर्ति वर्मा व्याख्याता
                        छत्तीसगढ़
—————————————
रोटी
सांसों की बेड़ियों से जकड़ी जिंदगी
दुनिया मे दुख ही दुख
बस यही है रोना
लेकिन
गम में भी मुस्कुराना यह भी एक कला है,
घर-घर की यही कहानी है
भूख थी और माँ बाप थे बूढ़े
रात बहन जो घर से निकली
उसका कारण रोटी थी
जो बेटों की बातें करता था
आज अस्पताल में है
तन पर सिर्फ लंगोटी थी
माँ का लाडला बीटा घर से बाहर गया है
अब तक गाँव नही लौटा
टूटी किस्मत के चश्मों की
शायद-
किस्मत खोटी थी
मैंने-
देखा,जब उस माँ का
उदास- किस्मत चेहरा
मुझे लगा-
तकदीर के कैदखानों में अभी तक सो रही है
और
चीख-चीख कर कह रही है
आज तक यातनाओं का सफर अकेले मैंने तय किया है
भूख से कुलबुलाते पेट का
आग को बुझाना
साल दर साल कठिन से कठिन होता जा रहा है
मंहगाई सीढ़ियां चढ़ना जानती है,उतरना नही
अब तो बस ये हाल है
जैसे-
रोटी से आधे पे उतरे,आधे से टुकड़े पर
लेकिन अब-
ये भी दुर्लभ हो गया है
लोग-
ये सोचने पर मजबूर हो गए
कि
रोटी से मौत,सस्ती है
क्यों न वही खरीद लें
     शन्नो आर्य
————————————–
          *ਪਰਵਾਜ਼*
ਜਿੰਦਗੀ ਮੈਂ ਫੇਰ ਤੋਂ ਪਰਵਾਜ਼ ਹੋਣਾ ਏ,
ਦੁੱਖਾਂ ਤੇ ਦਰਦਾਂ ਤੋਂ ਆਜ਼ਾਦ ਹੋਣਾ ਏ।
ਰੂਹ ਦੀ ਹਰ ਤਾਰ ਹੈ ਤਿੜਕੀ ਪਈ,
ਬੇਸੁਰੇ ਨੇ ਮੁੜ ਸੁਰੀਲਾ ਸਾਜ਼ ਹੋਣਾ ਏ।
ਨਾ ਕਦੇ ਪਿੱਛੇ ਮੂੜਾ,ਤੁਰਦਾ ਹੀ ਜਾਵਾਂਗਾ,
ਖ਼ੁਦ ਆਪਣੀ ਮੰਜ਼ਿਲ ਏ ਆਵਾਜ਼ ਹੋਣਾ ਏ।
ਸਮਝਿਆ ਨਾ ਕੋਈ ਜਿਸ ਖਾਮੋਸ਼ੀ  ਨੂੰ,
ਕੱਚ ਦੇ ਸ਼ੀਸ਼ੇ ਵਰਗਾ ਮੈਂ ਰਾਜ਼ ਹੋਣਾ ਏ।
                        –ਵੰਦਨਾ
————————————
जाति की उच्चता
लिंग की श्रेष्ठता
धर्म की भव्यता
संख्या की बहुलता
ये सभी मिल जायें
एक ही जगह होतो
मानव को दानव
बनाने में क्षण भी नही लगाती 
मिलकर इतनी श्रेष्टताएँ….-मुकेश यादव

लघु कविता मंच मंडी डबवाली द्वारा 24.05.2020 को ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें पंजाब, हरियाणा , राजस्थान व छतीसगढ़ से 20 के लगभग साहित्यकारों ने भाग लिया और अपनी रचनाएँ प्रस्तुत की | कार्यक्रम का संचालन लघु कविता मंच डबवाली के संयोजक कृष्ण कायत व वरिष्ठ साहित्यकार मीनाक्षी आहूजा ने संयुक्त रूप से किया | कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. रूपदेवगुण वरिष्ठ साहित्यकार सिरसा ने की और इस कार्यक्रम में निम्नलिखित साहित्यकारों ने भाग लिया :- 
1. प्रो. रूपदेवगुण सिरसा 
2. डॉ. शील कौशिक सिरसा 
3. डॉ. आरती बांसल सिरसा 
4. डॉ. ज्ञान प्रकाश पीयूष सिरसा 
5. श्री हरीश सेठी प्रवक्ता सिरसा 
6. श्री राकेश जैनबंधु रिसालिया खेडा
7. श्री दिलबाग विर्क प्रवक्ता मसीतां 
8. श्रीमती मुकेश यादव प्रधानाचार्या रोहतक 
9. श्रीमती कीर्ति वर्मा प्रवक्ता छत्तीसगढ़ 
10. श्रीमती ममता आहूजा शिक्षिका श्री गंगानगर राजस्थान 
11. श्रीमती शमिंदर कौर शिक्षिका श्री गंगानगर 
12. श्रीमती बीना जसानी  श्री गंगानगर 
13. श्रीमती सुषमा गुप्ता शिक्षिका श्री गंगानगर 
14. श्रीमती हर्ष भारती नागपाल प्रवक्ता सूरतगढ़ राजस्थान 
15. सुश्री वंदना वाणी संगीत प्रशिक्षिका मंडी डबवाली 
16. प्रो. चारू कालरा दिल्ली यूनिवर्सिटी , दिल्ली 
17. श्रीमती मीनाक्षी आहूजा प्रवक्ता श्री गंगानगर 
18. डॉ. शन्नो आर्य असिस्टेंट प्रोफैसर कालांवाली 
19. श्रीमती संतोष कुमारी 
20. श्री कृष्ण कायत संयोजक लघु कविता मंच , मंडी डबवाली |

2 Comments

  1. Meenakshi Ahuja

    May 28, 2020 at 5:09 am

    धन्यवाद To the point की टीम को। आपने सभी लघु कविताओं को साझा किया। आभार।

    Reply

  2. Meenakshi Ahuja

    May 28, 2020 at 5:09 am

    धन्यवाद To the point की टीम को। आपने सभी लघु कविताओं को साझा किया। आभार।

    Reply

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