हर रूप में
रंग भरती अपने संसार में…
जीवन के बारहमासे गा -गाकर
दुख-सुख के पतझड़ और वसंत को सहेजती स्त्री—
सिर्फ उजास ही बिखेरने की अभिलाषा लेकर जीती है ।
उसकी सोचें…
उसके तीज-त्योहार
सारे जीवन में आलोक ही तो भरते हैं…
देखा है मैंने…
माँ के गले में पड़ा जिउतिया गले में पड़े रंग खोता रहता है
और सशक्त होता रहता है
बेटे के जीवन का वट…
माँ की सोचों में।
बहना की राखी भाई की सलामती के आशाओं और उम्मीदों के दीप धरती आती आती है
और नैहर की देहरी को
नेह के उजास से
भर देती है..
आखिरी साँस तक पिया के लिए मंगलकामनाएँ सहेजे
संगिनी के सारे स्वप्न ही जुड़े होते हैं
उसके करवा और तीज में…
उसके गनगौर में सिर्फ स्नेह और माधुर्य का उजास ही तो दिखता है..
हर व्यथा को पी जाने का सामर्थ्य समेटे…
आलोकित करती अ पने घर-संसार को
सदा… स्नेह की बाती से
दीया बनकर ही तो जलती रहती है स्त्री
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कोई ख्वाब तो नहीं जो आंखों से ढल जाए
इश्क कोई मौसम तो नहीं जो हर रोज बदल जाए
इश्क तो मजहब है इश्क ही ईमान है
इश्क गीता है इश्क ही कुरान है
मंदिर की घंटियां और मस्जिद की अजान है
गिरजा की मोमबत्तियों में इश्क की सदा सुनाई देती है
कायनात की हर शय में इश्क की तस्वीर दिखाई देती है
इश्क मीरा है तो इश्क राधा भी है
इश्क़ शबरी है तो इश्क अहिल्या भी है
हीर शीरी फरहाद कैश में ही नहीं
इश्क तुम में भी है इश्क हम में भी
फूलों में तितलियों में जुगनुओं में इश्क दिखता है
शमा के पीछे परवाना यूं ही नहीं जलता है
इश्क धरती है इश्क अंबर है
इश्क आग है इश्क समंदर है
चांद पूनम का इश्क ही है
इश्क अमावस में खुदा की रोशनी है
इश्क देह नहीं मैं और तुम भी नहीं
रूह है इश्क़!!!!
इश्क आज नहीं कल नहीं सदा ही है
इश्क साकार है निराकार है
सृष्टि है संहार है
फिर से जीवन लेने की इच्छा का आधार भी है
इश्क की खातिर ही तो कोई मतवाला खुदा खुदा करता है
इश्क ही है कि एक कतरा समंदर में जाकर मिलता है
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भूख से बेकल अंतड़ियों
और
पाँव के ज़ख्मों का दर्द
एसी कमरों में बैठकर
सिर्फ वाह वाही के लिए
लिखा जा सकता है
अगर महसूस कर लो तो
लिख नहीं पाओगे
कलम जड़ हो जाएगी
और
उंगलियां काँपेंगी
और वाणी को लकवा मार जाएगा।
अंतहीन त्रासदी को झेलने के बाद
जब सिर्फ मौत मिलती है
और पीछे तिल तिल मरने को बचे
मुर्दा साँसों की उफ़ को
सत्ता के गलियारों से नहीं समझा जा सकता है
क्यों कि वहां से सिर्फ
राजनीति की चौपड़ बिछाई जा सकती है।
याद रखना राजनीति धृतराष्ट्र
तब तक न चेतेगा
जब तक आम जनता गांधारी बन
उसका अनुगमन करेगी।
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वह हृदय कहाँ
मधुमय सुरभित मधु कुसुम खिले
गुंजित हो जिस पर प्रीत भ्रमर
ऐसा सुरभित ऐसा सुष्मित
वह हृदय कहाँ बोलो जानाँ !!
आंसू पीड़ा संताप हरे
और दूर करे हर आकुलता
ऐसा स्नेहिल ऐसा पावन
वह हृदय कहाँ बोलो जानाँ!!
है तड़प प्रेम की जो मुझको
जो जन्म जन्म की अभिलाषा
मन के तम को जो दूर करें
वह हृदय कहाँ बोलो जानाँ!!
उतरे नभ से ऐसा निर्झर
मैं भीगूँ जिसमें रूह तलक
ले आए जो आकाश कुसुम
वह हृदय कहाँ बोलो जानाँ!!
मैं निकली प्रणय पुष्प लेकर
पर कोई दावेदार नहीं
इस झूठे संसृति सागर में
मैं सच्चा मोती ढूंढ रही
है विचलित मन अरु पग पथ से
अब आकर राह दिखा कान्हां
भवसागर की इस नैय्या का
है तुमसा खेवनहार कहांँ
नैनों से अविरल अश्रु बहे
और जिह्वा तुझे पुकार रही
यह रोम-रोम अब बेकल है
हो मेरे प्राणाधार कहाँ
माटी का पुतला हूं मैं तो
कान्हा तुमने ही प्राण भरा
जो तुमसे हुई विलग अब तो
जाऊँगी फिर मैं नाथ कहाँ।
सुनीता सामंत
अध्यापिका
शिक्षा: एम.ए. भी.एड.
रुचि: लेखन
उपलब्धियाँ- तीन साँझा संग्रह,एक ई-बुक
निवास- गोरखपुर
उत्तर प्रदेश


