बस लिखो
लिखना जरूरी है
ये दुनिया अग्निपथ है
रुको मत
चलते चलो
क्योकि
चलना जरूरी है
देखो मत
सोचो भी क्योकि सिर्फ
देखने से जंग लगती है और सोचने
से विचार जन्म लेते है
इसलिए सोचना भी जरूरी है
खोजो
और टटोलो
आवाज का पर्दा
मन ही मन
असत्य की परत पे लिखे
अक्षर में लिपटे अनपढ़ता की चादर
को ………इसलिए
बोलो
क्योकि
अब वक्त आ गया है
जब
बोलना बहुत ही जरूरी है
गूँगापन
थरथराती साँस
चुपचाप
खमोश
डर और
चमकते हुए रंगो की चालबाजी
सिर्फ नफरत ही पैदा करती है
और
भीतर ही भीतर
युद्ध की घोषणा
एक दूसरे के खिलाफ
जो रोज मिलते है हँस कर ख़ुशी ख़ुशी
हिस्सों में बटा और नराज
मैं भविष्य के
ओझल
अस्तित्व में
उलझ कर
डर रहा हूँ
दिमाग का आत्मघाती
तनाव
हो सकता है की
कभी जिंदगी का नक्शा ही बदल दे
ऐसी ही कोई ओझल सी शतरंज
यकायक बिछ जाती है
इसलिए
कभी कुर्सी और कभी वैसाखी
और कभी
समझोता
उम्मीद की
बस्तियाँ
जला देती है
और खुद की सियासत में देखिये
आपने ही हथियार की नोक पे अपना चेहरा
होता है
कभी कभी
तब
मैं अकेला
दर्पण में भी
भीड़ के रूप में नज़र आता हूँ
बस और कुछ नही तब
मैं अपने आप के लिए सवाल उठता हूँ
सवाल उठता रहूँगा
सवाल होंगे तो
इक दिन जबाव होगा
इंकलाब होगा
इसके लिए
मैं खुद खुद के खिलाफ
लिखता
चलता
सोचता
और बोलता रहूँगा ………
जिंदगी के गर्भ में ही सीख लूँगा
जीवन रूपी चक्रव्युह से बाहर निकलना…..shaad
2 Comments
खुद से खुद का इक सवाल
बस लिखो
लिखना जरूरी है
ये दुनिया अग्निपथ है
रुको मत
चलते चलो
क्योकि
चलना जरूरी है
देखो मत
सोचो भी क्योकि सिर्फ
देखने से जंग लगती है और सोचने
से विचार जन्म लेते है
इसलिए सोचना भी जरूरी है
खोजो
और टटोलो
आवाज का पर्दा
मन ही मन
असत्य की परत पे लिखे
अक्षर में लिपटे अनपढ़ता की चादर
को ………इसलिए
बोलो
क्योकि
अब वक्त आ गया है
जब
बोलना बहुत ही जरूरी है
गूँगापन
थरथराती साँस
चुपचाप
खमोश
डर और
चमकते हुए रंगो की चालबाजी
सिर्फ नफरत ही पैदा करती है
और
भीतर ही भीतर
युद्ध की घोषणा
एक दूसरे के खिलाफ
जो रोज मिलते है हँस कर ख़ुशी ख़ुशी
हिस्सों में बटा और नराज
मैं भविष्य के
ओझल
अस्तित्व में
उलझ कर
डर रहा हूँ
दिमाग का आत्मघाती
तनाव
हो सकता है की
कभी जिंदगी का नक्शा ही बदल दे
ऐसी ही कोई ओझल सी शतरंज
यकायक बिछ जाती है
इसलिए
कभी कुर्सी और कभी वैसाखी
और कभी
समझोता
उम्मीद की
बस्तियाँ
जला देती है
और खुद की सियासत में देखिये
आपने ही हथियार की नोक पे अपना चेहरा
होता है
कभी कभी
तब
मैं अकेला
दर्पण में भी
भीड़ के रूप में नज़र आता हूँ
बस और कुछ नही तब
मैं अपने आप के लिए सवाल उठता हूँ
सवाल उठता रहूँगा
सवाल होंगे तो
इक दिन जबाव होगा
इंकलाब होगा
इसके लिए
मैं खुद खुद के खिलाफ
लिखता
चलता
सोचता
और बोलता रहूँगा ………
जिंदगी के गर्भ में ही सीख लूँगा
जीवन रूपी चक्रव्युह से बाहर निकलना…..shaad
Check Also
खेलकूद से पैदा होती है अनुशासन की भावना: डा. संदीप गोयल
जीएनसी सिरसा में नैशनल स्पोर्ट्स डे पर हुआ आयोजन सिरसा: 29 अगस्त: व्यक्तित्व के सर्वांगीण …


Appachi Brand Rice
June 12, 2018 at 10:30 am
This post is really good. Thanks for sharing…
Appachi Brand Rice
June 12, 2018 at 10:30 am
This post is really good. Thanks for sharing…