शहर की भीड़ का मैं
इक आदमी
मुझमे इक जंगल रहता है
शेर गीदड़ हाथी सांप और कुत्ता
मोर हंस और कछुआ जैसे
विचार बन के
अनेको बार
मानसिक पटल पे उतरते है
गिरगट के रंग की तरह
मेरे चहेरे का रंग पल पल बदलता है
मैं शहर की भीड़ का इक आदमी……
मुझ में भी इक जंगल सा रहता है
गिलहरी तितली और चिड़िया सा बचपन छू-मन्त्र
अब तो बगला भक्त बन
मछली की तलाश में इक टांग पे मन खड़ा रहता है
मैं शहर की भीड़ का इक आदमी……
मेरे अंदर भी इक जंगल सा रहता है
बिल्ली मासी ने सारे सीखा दिए
जंगल के दाँव-पेच
इसलिए अंदर का
जंगल मंगल रहता है
मैं शहर की भीड़ का इक आदमी….
मुझ में भी इक जंगल रहता है
शुभ रात्रि…

