#युद्ध का 16वा दिन…
एक शब्द है प्रेम शायद लिखने में होगा शब्द मगर ये बड़ा ही पवित्र है संस्कार युक्त है हर किसी को होता है प्रेम गहराई में जा कर देखो तो ऐसा कोई नही है जिसको न हो आप को भी है आप भी प्रेम करते है स्वीकार करो कुछ प्रेम इतने छुपे होते है खुद को भी नही पता होता हमारे प्रेम का स्वरूप क्या है आधार क्या है बस ये भी एक प्रकार का युद्ध है प्रेम है भी ओर पता भी नही लोभ लालच क्रोध के पीछे भी प्रेम ही खड़ा है प्रेम को समझने वाला भी परम् है दुनियावी पढ़ाई नही बल्कि खुद को जानने की कला ही आपने प्रेम की पहचान करवाती है जो समझ जाते है वो आशिक हो जाते है
बस एक बार रुक कर सोचना की मुझे किस से प्रेम है किस पर मेरा ध्यान केंद्रित है तो शायद सरल होना आसान हो जाएगा
सब्जी खरीदते हुए रेहड़ी वाले से जब मैने पूछा कि क्या भाव है तो उसने मुस्करा कर कहा कि भाव नही मूल्य पूछो जनाब भाव तो प्रेम का होता है …..प्रेम तो अहसास है अनुभव है जिस वक्त प्रेम पैदा हो या खुद में प्रेम का भाव जागे बस उसी प्रेम के पल को जाग कर साक्षी भाव से देखना वो पल अनूठा उत्साह उमंग ओर शांति से भरा होगा बस एक मुश्किल है इसके लिए प्रेम देना पड़ेगा क्योंकि प्रेम की भीख मिलती नही ये खजाना तो हर किसी के पास है जो लौटाना पड़ता है बाटना पड़ता है देना पड़ता है
तू ही तू ….प्रेम गली अति सांकरी दो नही समाए।।

