इन गलियों में आने के अब भी हैं, बहाने हैं ।
कुछ लोग नये होंगें, बाकि तो पुराने हैं ।।
वो सहन, वो चौबारे, वो चौखट, वो खिड़की,
कुछ भी तो नही बदला, जाने-पहचाने हैं ।।
माँ जैसी हवेली की देहरी को चूमूंगा,
फिर साथ में यारों के अमरूद भी खाने हैं ।।
अम्माँ संग बाबूजी, मुंडेर पै दिखते हैं,
यादों की गठरी में पुरज़ोर ख़ज़ाने हैं ।।
इक पहला प्यार भी था, जो दौड़ में छूट गया,
इमली की बगिया के उजड़े वो ठिकाने हैं ।।
जब रात की रोटी पै मेहमान भी जुड़ते थे,
इक वो भी ज़माना था, इक ये भी ज़माने हैं ।।
दादी, मौसी, बूआ, ताऊ अब कौन कहे,
अब तो अंकल-आंटी, कह-कह के निभाने हैं ।।
वो दरिया सूख गये, वो पुल भी टूट गये,
‘मुदगिल जी’ हम तो बस यादों के दिवाने हैं ।
–योगेन्द्र मौदगिल

