जीते जी कोई नहीं है
जो कहे की तुम कितने अच्छे हो
और
कभी कभी गूँगा और बहरा होने को मन करता है
और रही आँखे बन्द करके सोने को मन करता है
लो तुम भी छोड़ दो हथियार
मैंने भी रख दी कलम
अब तुम
भी अच्छे हो
और मैं भी कितना अच्छा हूँ
और संसार भी लेकिन
दुनिया इसे इक समझोता ही कहेगी और समझेगी
क्योकि
तुम भी ज़िंदा हो
और मैं भी ज़िंदा हूँ
और दुनिया तो मरने के बाद ही किसी नतीजे पे आती है
की कौन अच्छा और………….
और मैंने उठा ली कलम
और तू भी उठा हथियार
क्योकि
राजमहल के खिलाफ मेरा युद्ध जारी है ।
हर कोई वैसा ही रहता है जैसा वो है जीते जी और मरने के बाद भी…
इसलिए मैंने इक नई कविता लिखी है और शीर्षक है
“मझे अच्छा ना कहना”
मेरे मरने के बाद…. मेरी श्रदांजलि सभा में।।
ज़िन्दगी ज़िंदाबाद
Sanjiv shaad



दिलबागसिंह विर्क
June 24, 2020 at 2:13 pm
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा – 3743 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
धन्यवाद
दिलबागसिंह विर्क
दिलबागसिंह विर्क
June 24, 2020 at 2:13 pm
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा – 3743 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
धन्यवाद
दिलबागसिंह विर्क