इन दिनों|इन दिनोंरास्ते कहीं नहीं जातेबाग बगीचों सेबच्चों की खिलखिलाहटेंगायब हैंसड़कों और पार्कों मेंखड़े बुतबतिया रहे हैंपंछियों के संगबीते ज़माने की बातेंतेजी से फैलतीमौत की खबर सेउनके पथरीले माथे परउभर आई हैंचिंता की रेखाएंसड़कों पर पसरा मौनउन्हें बता रहा हैकि मनुष्य के पासनहीं बचा है अबएक भी उपायमौत को स्थगित करने का –आरती —————————————-वही किस्सा पुराना | ग़ज़ल (देविन्द्र बीबीपुरिया) वही …
काव्य कुंज…कविता की बात

