शहर की भीड़ का मैं इक आदमी मुझमे इक जंगल रहता हैशेर गीदड़ हाथी सांप और कुत्ता मोर हंस और कछुआ जैसेविचार बन के अनेको बार मानसिक पटल पे उतरते है गिरगट के रंग की तरह मेरे चहेरे का रंग पल पल बदलता हैमैं शहर की भीड़ का इक आदमी……मुझ में भी इक जंगल सा रहता है गिलहरी तितली और …

