जीएनसी सिरसा में श्री गुरु तेग बहादुर जी: शब्द एवं शहादत विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार का दूसरा दिन का शुभारंभ

गुरु तेग बहादुर जी की शहादत को किसी एक धर्म या किसी एक समुदाय के साथ जोड़ना उसको छोटा करना है क्योंकि उन्होंने अपनी शहादत मानवीय अधिकारों के लिए दी । आज के दौर में पीड़ितों, अल्पसंख्यकों व दबे कुचले लोगों के पक्ष में खड़ना उनकी आवाज बनना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि है । किसी विचार को मात्र पूजनीय बनाने की बजाय उसको अपने जीवन में अपनाना ज्यादा जरूरी होता है । यह बात भाई कन्हैया सेवा समिति के मुख्य सेवादार भाई गुरविंदर सिंह पद्मश्री ने श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहादत वर्ष के उपलक्ष्य राजकीय नैशनल महाविद्यालय, सिरसा में पंजाबी साहित्य अकाडमी, लुधियाना के तत्वावधान में पंजाबी लेखक सभा, सिरसा एवं पंजाबी विभाग, सरकारी नैशनल महाविद्यालय, सिरसा के सहयोग से ‘श्री गुरु तेग बहादुर जी: शब्द एवं शहादत’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के दूसरे दिन के पांचवें सत्र में मुख्य अतिथि के तौर पर अपने संबोधन में व्यक्त किए। सेमिनार के पांचवें सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. रतन सिंह ढिल्लों , प्रो. गुरदेव सिंह देव, मुख्य अतिथि के रूप में भाई कन्हैया आश्रम सिरसा के संचालक गुरविंदर सिंह पद्मश्री, आधारित अध्यक्षमंडल ने की। प्रो. रत्न सिंह ढिल्लों ने कहा कि आज भी गुरु तेग बहादुर की गुरबाणी की प्रासंगिकता है क्योंकि आज भी व्यक्ति की निजी आजादी व मानवीय अधिकारों पर हमला हो रहा है । इस सत्र में विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिरकत करते हुए पंजाबी विभाग के प्रो.गुरसाहिब सिंह ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी की शहादत को आज के वैश्वीकरण के दौर के अनुसार समझने की जरूरत है क्योंकि आज के दौर में प्रवास के कारण सभी देश व प्रदेश बहु कौमी हो चुके हैं व डॉ करनैल चंद प्रध्यापक डाइट करनाल ने कहा कि उस दौर के क्रूर समय में भी धर्मनिरपेक्षता व मानवीय मूल्यों के शहादत देकर मिसाल कायम की। मंच संचालन डॉ हरविंदर सिंह सिरसा ने किया ।
इस अवसर पर डॉ बीरबल सिंह ने अपना पर्चा पेश करते हुए कहा कि गुरु तेग बहादुर जी ने धर्मनिरपेक्ष रहते हुए मानवीय मूल्यों का नारा बुलंद किया । उनकी श्लोक सिर्फ आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि मानव को डर तथा भय से मुक्त करते हैं । उनकी शहादत को समझने के उनकी विचारधारा को उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझने की जरूरत है ।
अमनदीप कौर सिरसा ने अपना पर्चा प्रस्तुत करते हुए कहा कि गुरु तेग बहादुर ने तानाशाही व ज़ुल्म के विरुद्ध जूझने व कुर्बानी देने का विचार अपनी वाणी के माध्यम से दिया । गुरु तेग बहादुर की वाणी मनुष्य को दृढ़ और बलवान बनने का संदेश देती है। साथ ही, यह उस समय की सामाजिक व्यवस्था द्वारा शांति और अमन के झूठे नारों के आड़ में किए जा रहे अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष के लिए भी प्रेरित करती है। गुरु तेग बहादुर जी का जीवन-दर्शन और उनकी शहादत समकालीन मानवता के हृदय में सत्य, न्याय, अधिकार और मानवीय मूल्यों की रक्षा हेतु स्वयं को समर्पित करने व बलिदान का भाव जागृत करती है।
दो दिन तक चले इस सेमिनार में छः सत्र हुए जिनमें छठे सत्र में शोधार्थियों द्वारा अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किये गए । इस सेमिनार में विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों व विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों ने ‘गुरु तेग बहादुर जी: शब्द एवं शहादत’ विषय व इससे संबंधित उप-विषयों के बारे अपने विचार प्रस्तुत प्रस्तुत किये । सेमिनार के दौरान दो दिन तक सेवा निभाने के लिए सुखदेव सिंह ढिल्लों के नेतृत्व में उनकी स्काउट की विशेष भूमिका रही इसलिए पूरी टीम को सम्मानित किया गया । सेमिनार के दूसरे दिन डॉ. सुखदेव सिंह सिरसा, डॉ सरबजीत सिंह अध्यक्ष पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना, कॉमरेड स्वर्ण सिंह विर्क, गुलज़ार सिंह पंधेर, प्रिंसिपल अरवेल सिंह विर्क, जगदेव सिंह फौगाट, कृष्णा फौगाट, सुखेदव सिंह जम्मू, गुरप्रीत सिन्धरा, डॉ बिक्करजीत सिंह,एडवोकेट रमेश महता, लेखराज ढोट,अंशुल छत्रपति, सुरजीत सिंह सिरड़ी इत्यादि समेत विशाल संख्या में प्रतिनिधियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाई ।
Sanjivv Shaad
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