जगजीत सिंह: वो आवाज़ जो दिल के पार उतर जाती है(पुण्यतिथि — 10 अक्टूबर 2011)
आज पुण्यतिथि पर 10 अक्टूबर..

कभी-कभी कुछ आवाज़ें सिर्फ़ सुनाई नहीं देतीं — महसूस होती हैं।
वो कानों से नहीं, दिल की गहराइयों से होकर गुज़रती हैं। जगजीत सिंह की आवाज़ भी ऐसी ही थी — एक ऐसा सुकून, जिसमें दर्द भी था; एक ऐसा दर्द, जिसमें सुकून भी था। उनकी ग़ज़लें सुनते हुए लगता है जैसे किसी ने हमारे ही ज़ख्मों को सुरों से सहलाया हो। वो गाते नहीं थे, कहते थे — और हर शेर, हर लफ़्ज़ हमारे भीतर उतर जाता था।
“कोई फ़रिया’द तेरे दिल में दबी हो जैसे,
तू किसी रह में किसी से ख़फ़ा हो जैसे।”
ग़ज़लों का वो दौर, जो जगजीत का हो गया
जब ग़ज़ल सिर्फ़ महफ़िलों और उर्दू अदब तक सीमित थी, तब जगजीत सिंह ने उसे आम आदमी तक पहुँचाया। उन्होंने ग़ज़ल को सरल, मधुर, और दिल से जोड़ने वाला बना दिया।
“होठों से छू लो तुम,”
“वो कागज़ की कश्ती,”
“झुकी झुकी सी नज़र,”
“तुमको देखा तो ये ख़याल आया” —
हर गाना, हर अल्फ़ाज़, एक कहानी कहता है।
उनकी आवाज़ में वो जादू था जो वक्त को थमा देता था,
और दर्द को भी खूबसूरत बना देता था।
दर्द जो सुर बन गया
ज़िंदगी ने उन्हें बहुत कुछ दिया, और बहुत कुछ छीन भी लिया।
बेटे विवेक की असमय मौत ने उन्हें तोड़ दिया था,
मगर उन्होंने उस टूटन को संगीत का रंग दे दिया।
शायद इसलिए उनकी ग़ज़लों में वो गहराई है जो किसी किताब से नहीं,
ज़िंदगी के तजुर्बे से निकली है।
“कहाँ तक सुनेगा, वो हर बात कह दे,
जो कुछ भी है दिल में, वो सब कुछ कह दे।”
एक आवाज़ जो आज भी ज़िंदा है
10 अक्टूबर 2011 — वो दिन जब जगजीत सिंह चले गए।
पर सच तो यह है कि वो कभी गए ही नहीं।
वो हर चाय की चुस्की में,
हर शाम की ख़ामोशी में,
हर दर्दभरे पल में अब भी गूंजते हैं।
“हर लफ़्ज़ में उनकी रूह बसती है,
हर सुर में कोई कहानी कहती है।
जगजीत गए मगर छोड़ गए वो जादू,
जो आज भी हर दिल में गूंजती है।”
आख़िरी सुर में लिखा एक सलाम
जगजीत सिंह सिर्फ़ एक गायक नहीं थे —
वो एहसासों के शायर थे, दर्द के फ़लसफ़ी,
और सुकून के साज़गार उनकी आवाज़ अब भी हमें याद दिलाती है कि —
संगीत सिर्फ़ सुरों का मेल नहीं,
बल्कि दिल की धड़कनों का एहसास है।
“वो ग़ज़लें आज भी ज़िंदा हैं… बस गायक बदल गए हैं।”
Sanjivv Shaad
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