Home News Point सशक्त प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन समय की अनिवार्यता : डा. सुखदेव सिंह सिरसा

सशक्त प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन समय की अनिवार्यता : डा. सुखदेव सिंह सिरसा

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सिरसा: 12 अप्रैल::-1935-36 के दौरान अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर मानवीय समाज को दरपेश जिन परिस्थितियों के दौरान प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन अस्तित्व में आया वर्तमान में भी वैसी ही परिस्थितियॉं निर्मित की जा रही हैं अतः सशक्त और सक्रिय प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन समय की सबसे बड़ी अनिवार्यता है। यह विचार अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के राष्ट्रीय महासचिव डा. सुखदेव सिंह सिरसा ने प्रलेस सिरसा के तत्वावधान में प्रलेस के 89वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में श्री युवक साहित्य सदन, सिरसा में आयोजित ‘विमर्श, पुस्तक परिचर्चा व काव्य गोष्ठी’ कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के तौर पर ‘प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन एवं वैश्विक परिदृश्य’ विषय पर अपने विमर्श में व्यक्त किए।

उन्होंने प्रगतिशील साहित्यिक आंदोलन की इंकलाबी और जनपक्षीय विरासत के बारे में तफसील से अवगत करवाते हुए कहा कि आज लेखकों को लेखन के साथ सामाजिक कार्यकर्त्ता के तौर पर मज़दूरों, किसानों, कर्मचारियों, दमितों एवं वंचितों के जनसंघर्षों में उनके साथ खड़ा होना ही होगा। जिओनिस्ट स्टेट इस्राईल के ख़िलाफ़ फिलस्तीनी आवाम के संघर्ष को समर्पित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव डा. सुखदेव सिंह सिरसा, पंजाब प्रलेस अध्यक्ष प्रो. सुरजीत जज्ज, हरियाणा प्रलेस अध्यक्ष डा. सुभाष मानसा, उपाध्यक्ष परमानंद शास्त्री, प्रलेस राष्ट्रीय सचिवमंडल सदस्य एवं हरियाणा प्रलेस के महासचिव डा. हरविंदर सिंह सिरसा व प्रलेस सिरसा के अध्यक्ष डा. गुरप्रीत सिंह सिंधरा पर आधारित अध्यक्षमंडल ने की।

परमानंद शास्त्री द्वारा सभी अतिथिगण व उपस्थितजन के स्वागत उपरान्त कार्यक्रम का आगाज़ कुलदीप सिरसा द्वारा प्रस्तुत इंकलाबी गीत की भावपूर्ण एवं शानदार प्रस्तुति से हुआ। विमर्श पर आधारित प्रथम सत्र में पंजाब प्रलेस अध्यक्ष प्रो. सुरजीत जज्ज ने ‘सामाजिक दायित्व एवं सृजन’ विषय पर अपने संबोधन में कहा कि सृजन व्यक्तिगत होने के बावज़ूद लेखक व लेखन का सरोकार सामाजिक ही होता है। लेखक व लेखन कभी भी निष्पक्ष नहीं होता उसे सदैव जनपक्षीय होना ही होता है। उन्होंने कहा कि सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता ही लेखक का दायित्व है। दूसरे सत्र में सुरजीत जज्ज के हिंदी ग़ज़ल संग्रह ‘तेरी मेरी आवाज़ें’ के लोकार्पण उपरान्त इस ग़ज़ल संग्रह पर आयोजित पुस्तक परिचर्चा में प्रख्यात कवि, कथाकार, शिक्षाविद एवं प्रबुद्ध समीक्षक प्रो. हरभगवान चावला व हिंदी ग़ज़ल के स्थापित हस्ताक्षर लाज पुष्प ने समीक्षा प्रस्तुत की। प्रो. हरभगवान चावला ने कहा कि सुरजीत जज्ज की शायरी जनपक्षीय है; सिर उठाकर और सीना तान कर ज़ालिम सत्ता के सामने खड़ी होती है, साथ ही व्यक्ति की श्रेष्ठ भावनाओं और संवेदनाओं को बचाती है। लाज पुष्प ने इस ग़ज़ल संग्रह को एक प्रभावशाली दस्तावेज बताते हुए कहा कि सुरजीत जज्ज की शायरी अपने आप को महसूस करने का आह्वान ही नहीं करती अपितु पाठक के भीतर उतरकर एक ऐसी आंच तैयार करती है जो पाठक को खदबदाने लगती है। कार्यक्रम का संचालन डा. हरविंदर सिंह सिरसा ने किया। कार्यक्रम के अंतिम सत्र में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें प्रो. आर पी सेठी ‘कमाल’, गुरतेज बराड़, कुलदीप सिरसा, दिनेश हरमन, डा. आरती बंसल, डा. हरमीत कौर, अमरजीत सिंह संधु, सुरेश बरनवाल, अमनदीप कौर मान मिट्ठड़ी, हरजीत सिंह देसु मलकाना, अनीश कुमार व ईशनजोत कौर ने सामाजिक सरोकारों से सराबोर कविताओं व गीतों की ख़ूबसूरत एवं भावपूर्ण प्रस्तुति दी। इस अवसर पर वरिष्ठ जुझारू सामाजिक कार्यकर्त्ता बूटा सिंह द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव में जंग के दौरान मारे गए फिलस्तीनी बच्चों, महिलाओं समेत सभी नागरिकों को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए जंग के प्रति ज़िम्मेदार शक्तियों की निंदा की गई। प्रस्ताव में जिओनिस्ट इस्राइली स्टेट के खिलाफ फिलस्तीनी जनता के संघर्ष का समर्थन किया गया जिसे उपस्थितजन द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया। अपने अध्यक्षीय संबोधन में हरियाणा प्रलेस अध्यक्ष डा. सुभाष मानसा ने कहा कि लेखक होने से पहले एक संवेदनशील मानव होना अति अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि लेखन सदैव प्रतिरोध से पैदा होता है और यही लेखन की जनपक्षीय अवधारणा है। प्रलेस सिरसा अध्यक्ष डा. गुरप्रीत सिंह सिंधरा ने सभी अतिथिगण व उपस्थितजन के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर उत्तम सिंह ग्रोवर, प्रवीण बागला, डा. वेद बैनीवाल, बचन सिंह मौजी, प्रो. रूप देवगुण, हरीश सेठी झिलमिल, प्रो. राजेंद्र भंवरिया, डा. के के डूडी, जगदेव फोगाट, महल सिंह संधु, भगवंत सिंह सेठी, विनोद सिल्ला, डा. कर्मजीत सिंह, सुरिंदरपाल सिंह साथी, भूपिंदर पन्नीवालिया, बलजीत बिट्टू मलकपुरा, का. कृपाशंकर त्रिपाठी, का. लक्ष्मण सिंह शेखावत, का. रघुबीर सिंह नकौड़ा, का. राजकुमार शेखुपुरिया, का. जगरूप सिंह चौबुर्जा, का. तिलकराज विनायक, का. टोनी सागू, मेजर शक्तिराज कौशिक, प्रो. हरजिंदर सिंह, डा. विक्रम बंसल, वीरेंदर भाटिया, शील कौशिक, डा. हरविंदर कौर, डा. अनीता मड़िया, डा. लखवीर सिंह, चरनजीत सिंह, मुस्कान, सिमरन, दर्शन लाल, रमेश शास्त्री, डा. शेर चंद, सुशील पुरी, सुरजीत रेणु, नवनीत रेणु, कुलवंत सिंह, हीरा सिंह, हरभजन सिंह चट्ठा, राहुल सैनी, गुरसेवक सिंह, धर्म सिंह मोंगा, चिरंजी लाल, बिक्कर सिंह, सतनाम सिंह भंगु, महेंद्र बोस, मंगत राम, सुमित परिहार, ऋषि सोढ़ी, ओमप्रकाश चावला, सतीश, रविंद्र, विनोद कुमार, रिंपल सिंह, लखवीर सिंह इत्यादि सहित विशाल संख्या में प्रबुद्धजन ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाई। कार्यक्रम का समापन कुलदीप सिरसा द्वारा प्रस्तुत एक इंकलाबी गीत की भावपूर्ण एवं शानदार प्रस्तुति से हुआ।

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